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विश्व अर्थव्यवस्था का अगुआ बनता भारत

दूसरे देशों में जहां निवेश गिर रहा है, वहीं भारत में इस साल एफडीआई में 40 फीसदी का इजाफा हुआ है।

विश्व अर्थव्यवस्था का अगुआ बनता भारत
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अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और संयुक्त राष्ट्र व्यापार एवं विकास पर सम्मेलन (अंकटाड) ने अपनी-अपनी रिपोर्ट में कहा हैकि चालू वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था में विकास की रफ्तार अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में सबसे तेज रहेगी। दोनों ने 2015-16 में भारत की विकास दर 7.5 फीसदी जबकि चीन की विकास दर 6.3 फीसदी रहने का अनुमान लगाया है। जाहिर है, भारत विकास के मामले में चीन को पीछे छोड़ते हुए विश्व की सबसे तेज रफ्तर वाली अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। इन रिपोटरें से केंद्र सरकार के दावे की पुष्टि हो रही हैकि आने वाले दिनों में भारत दुनिया की आर्थिक दशा व दिशा तय करेगा। बहरहाल, ग्लोबल अर्थव्यवस्था के धुंधले आसमान में भारत एक चमकता हुआ सितारा की तरह उभर रहा है तो इसकी वजहें भी हैं। दरअसल, केंद्र में मोदी सरकार के आने के बाद कई नीतिगत सुधारों और विदेशी व घरेलू निवेशकों में अर्थव्यवस्था के प्रति विश्वास बढ़ने से आर्थिक गतिविधियों में तेजी आई है। वहीं जिंसों की अंतरराष्ट्रीय कीमतें गिरने और महंगाई में उम्मीद से ज्यादा गिरावट से भी भारत को फायदा पहुंचा है। इसके अलावा कच्चे तेल की कीमतें कम रहने का भी सबसे ज्यादा फायदा भारत जैसे विकासशील देश को हुआ है। आज दुनिया में भारत ही एकमात्र ऐसा देश है जो विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ रहा है जबकि दुनिया में मंदी छाई हुई है। अमेरिका को छोड़ दें तो तमाम यूरोपीय देशों सहित रूस, जापान आदि देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी रेंगने की स्थिति में पहुंच गई हैं। हाल के दिनों तक चीन विश्व अर्थव्यवस्था का केंद्र बना हुआ था, लेकिन उसका भी बुलबुला अब फूट गया है। इन दिनों निर्यात आधारित उसकी अर्थव्यवस्था मंदी में फंस गई है। निर्यात को बढ़ाने के लिए वह अपनी मुद्रा का कई बार अवमूल्यन कर चुका है, इसके बाद भी उसके उत्पादन की मांग नहीं बढ़ रही है, जिससे वहां निवेशकों में निराशा छाने लगी है। उन्हें इससे निकलने का कोई मार्ग नहीं दिख रहा है। ऐसे में विशेषज्ञ कहने लगे हैं कि आने वाले दिनों में भारत चीन का स्थान ले लेगा। इसमें वह क्षमता है कि जिसका यदि उचित दोहन किया जाए तो यह विश्व अर्थव्यवस्था को मंदी से उबारने में मददगार हो सकता है। वहीं केंद्र में ऐसी सरकार आई है जो तेजी से फैसले ले रही है जिससे माहौल बेहतर हुआ है। यही वजह है कि दुनिया का भारत में भरोसा बढ़ा है। दूसरे देशों में जहां निवेश गिर रहा है, वहीं भारत में इस साल एफडीआई में 40 फीसदी का इजाफा हुआ है, लेकिन अभी कई अड़चनें हैं जिन्हें दूर करना जरूरी है। भले ही यहां लोकतंत्र है, बड़ी आबादी है, जिसकी अच्छी क्रय शक्ति है। साथ ही बड़े पैमाने पर र्शम शक्ति है, लेकिन दूसरी ओर देश में कारोबार करना काफी कठिन है। उद्योग लगाने की प्रक्रिया काफी जटिल है। कर नीतियों में एकरूपता नहीं है। इंफ्रास्ट्रक्चर विकास की गति बेहद धीमी है। वहीं र्शम नीति को लेकर भी तमाम तरह की शिकायतें हैं। हालांकि मोदी सरकार तमाम सुधारों को आगे बढ़ाने को प्रतिबद्ध दिखती है और उन पर आगे भी बढ़ रही है जिससे आने वाले दिनों में और बेहतर नतीजे देखने को मिल सकते हैं। लिहाजा देसी और विदेशी निवेशकों को भी इस बदली हुई परिस्थितियों का लाभ उठाते हुए भारत के विकास में भागीदार बनना चाहिए।

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