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चिंतनः संविधान को जन-जन तक पहुंचाना जरूरी

भारतीय संविधान को 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने आम सहमति से अंगीकृत और अधिनियमित किया था।

चिंतनः संविधान को जन-जन तक पहुंचाना जरूरी
देश में संविधान दिवस मनाने का फैसला इस लिहाज से महत्वपूर्ण है कि इससे संविधान के प्रति लोगों में जागरुकता बढ़ेगी। इस अवसर पर पूरे देश में संविधान साक्षरता पर जोर दिया जाना है। इसमें कोई दो राय नहीं कि देश की जनता को संविधान के बारे में जानकारी कम है।
अधिकांश आबादी की इसकी मूल भावना से अनभिज्ञता बड़ी चुनौती है। ऐसे में करीब साढ़े छह दशक बाद ही सही संसद सहित पूरा देश में चर्चा से यह समझने में आसानी होगी कि संविधान निर्माताओं ने समाज के लिए क्या सपने देखे थे और अब तक के सफर में उनकी उम्मीदें कितनी पूरी हुई हैं।
भारतीय संविधान को 26 नवंबर, 1949 को संविधान सभा ने आम सहमति से अंगीकृत और अधिनियमित किया था। इसी दिन विश्व के सबसे बड़े लिखित संविधान को स्वीकृति मिली, जिसके बाद 26 जनवरी, 1950 को भारत को न सिर्फ एक गणतंत्र के रूप में पहचान मिली, बल्कि एकात्मक और संघात्मक शासन प्रणाली का मिला जुला रूप मिला। स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय प्रणाली मिली।
मौलिक अधिकार मिले और नागरिक के रूप में देश के प्रति कर्त्तव्यों की जिम्मेदारी मिली। संविधान सभा ने दो वर्ष, 11 माह और 17 दिनों की कड़ी मेहनत के बाद संविधान को बनाया था। यह एक साथ लचीला होने के साथ-साथ कठोर भी है।
दरअसल, संविधान निर्माताओं का मानना था कि भविष्य में आने वाली चुनौतियों के अनुरूप संसद संविधान के प्रावधानों में संशोधन कर सकता है, लेकिन ये संशोधन उसी सीमा तक होंगे जहां तक इसकी मूल भावना को अतिक्रमण नहीं करते हों। संविधान लागू होने के बाद अब तक इसमें सौ से ज्यादा संशोधन हो चुके हैं। इसके जानकारों का मानना है कि द्वितीय विश्व युद्ध के बाद तैयार हुए देशों के संविधान में भारतीय संविधान सबसे ठोस, अक्षुण्ण, देश की एकता-अखंडता को एक सुत्र में पिरोए रखने वाला है। हमारे लोकतंत्र की बुनियाद भी संविधान ही है। इसने देश को एक दिशा दिखाई है।
यह इसकी बड़ी खूबी है कि अपने रौ में चलता आ रहा है और चाहे सत्तापक्ष हो या विपक्ष हो सभी संविधान की दुहाई देकर आगे बढ़ते हैं। संविधान की प्रस्तावना के अनुसार भारत के नागरिकों को स्वतंत्रता और समानता के साथ-साथ सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक न्याय, पद, अवसर, और कानून की समानता, विचार, भाषण, विश्वास, व्यवसाय, संघ निर्माण और कार्य की स्वतंत्रता सुनिश्चित होती है। इसमें सभी वर्ग, जाति, धर्म, लिंग और समूह के नागरिकों के हितों की रक्षा की गारंटी दी गई है, लेकिन यह दुखद है कि संविधान लागू होने के इतने दिनों बाद भी समाज का बड़ा वर्ग बुनियादी आवश्यकताओं की पूर्ति से कोसों दूर है।
वित्तीय समावेशन का लाभ बड़े हिस्से को नहीं मिल पा रहा है। चुनाव प्रणाली इतनी महंगी हो गई है कि सामान्य उम्मीदवार के लिए इसमें भाग लेना असंभव हो गया है। भ्रष्टाचार तमाम संस्थाओं को अपनी चपेट में ले चुका है। व्यवस्थाएं इतनी जटिल हो गईं हैं कि कतार में खड़ा अंतिम व्यक्ति असहाय महसूस कर रहा है। हालांकि मताधिकार और मौलिक अधिकारों का प्रावधान देश के नागरिकों को एक बड़ी शक्ति प्रदान करता है। गत साढ़े छह दशक बाद देश ने कई मोचरें पर तरक्की की है, लेकिन अभी इसे लंबा सफर तय करना शेष है। इस लिहाज से भारतीय लोकतंत्र और संसदीय व्यवस्था के लिए यह संविधान दिवस महती भूमिका निभा सकता है।
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