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भारत-नेपाल के बीच खत्म होगी अविश्वास की खाई

भारत की इच्छा सिर्फ इतनी ही है कि पड़ोसी देश का संविधान समेकित हो।

भारत-नेपाल के बीच खत्म होगी अविश्वास की खाई
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नई दिल्ली. पड़ोसी देश नेपाल के उप-प्रधानमंत्री कमल थापा की भारत यात्रा को विगत दो महीनों के दौरान दोनों देशों के बीच जो अविश्वास की खाई बन गई है उसे पाटने की कोशिश के रूप में देखा जा सकता है। इसकी उम्मीद इसलिए भी की जाने लगी है क्योंकि रविवार को थापा और भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज के बीच मुलाकात एक सार्थक बातचीत के साथ खत्म हुई।

बताया जा रहा है कि इस वार्ता के तात्कालिक और दीर्घकालिक उद्देश्य हैं। तात्कालिक उद्देश्य है, नेपाल में जरूरी वस्तुओं की आवाजाही को सुचारू करना और नेपाल के नए प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली को भारत दौरा कराना जिससे द्विपक्षीय रिश्तों को नए सिरे से आकार दिया जा सके।

अभी दो हजार से ज्यादा ट्रक बिहार की सीमाओं पर खड़े हैं, क्योंकि नेपाल के आंतरिक हालात सामान्य नहीं हैं। यह अव्यवस्था नेपाल के मधेसी और थारू समुदायों के आंदोलन के कारण पैदा हुई है, इनका विरोध इस बात के लिए है कि हाल में लागू हुए संविधान में उनकी उपेक्षा की गई है। उनकी मांग है कि संविधान में संशोधन कर उन्हें उचित प्रतिनिधित्व दिया जाए। जबकि दूसरी ओर नेपाल आरोप लगा रहा हैकि भारत ने जानबूझकर सीमापर नाकेबंदी कर दी है।

वहीं भारत इसे सिरे से नकारता रहा है कि समस्या नेपाल के अंदर है, इसी वजह से ट्रक उसकी सीमा में प्रवेश नहीं कर पा रहे हैं। मौजूदा हालात में ट्रक मालिक असुरक्षित महसूस कर रहे हैं, लेकिन भारत की बातों पर विश्वास करने के बजाय उसने न सिर्फ संयुक्त राष्ट्र में इसकी शिकायत की, बल्कि चीन के साथ जाने की खुलेआम धमकी दी। इससे दोनों देशों के बीच मतभेद गहरा गए हैं। वहीं दीर्घकालिक उद्देश्य है, संविधान की कमियों को दूर करने में नेपाल की सरकार की मदद करना जिससे तराई के लोगों के गुस्से को शांत किया जा सके।

इस प्रकार से देखा जाए तो यह केंद्र सरकार की कूटनीतिक सफलता है, जो बीते दिनों असफल रही थी। विदेश सचिव एस जयशंकर की यात्रा के बाद भी नेपाल की संसद ने विभाजनकारी संविधान पारित कर दिया था। नेपाल का पड़ोसी देश होने व सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक रूप से गहराई से जुड़े होने के नाते भारत का दायित्व बनता हैकि वहां पैदा हुए संकट का सर्वमान्य हल खोजने के लिए नेपाल के राजनीतिक दलों को एक मंच पर लाए और उन्हें वार्ता के लिए प्रेरित करे। भारत के खिलाफ नेपाल का मौजूदा विरोध गैरवाजिब है।

भारत की इच्छा सिर्फ इतनी ही है कि पड़ोसी देश का संविधान समेकित हो। हर नेपालवासी को लगे कि इसमें उसकी इच्छाओं को सम्मानपूर्वक स्थान दिया गया है, लेकिन केंद्र सरकार को अपनी भूमिका का निर्वाहन इस प्रकार करना होगा जिससे नेपाल को यह न लगे कि नई दिल्ली उसके आंतरिक मामले में हस्तक्षेप कर रही है। वहीं मौजूदा विरोध-प्रदर्शन के चलते नेपाल के दूसरे मुद्दे गौड़ हो गए हैं। भूकंप व सामाजिक विभाजन से नेपाल के आम लोगों की हालत दयनीय है। वहां बिजली, पानी, भोजन और दवाओं का व्यापक अभाव है। जाहिर है, इन समस्याओं को दूर करने के लिए दोनों देशों को परस्पर अविश्वास की खाई को पाटनी होगी।

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