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जश्न मनाने के साथ मंथन करने का वक्त

क्या हमारी व्यवस्था देश के हर नागरिक को शिक्षा, भोजन, रोजगार, समान अवसर, सम्मान और न्याय दे पाने में सफल हो पाई है।

जश्न मनाने के साथ मंथन करने का वक्त

नई दिल्‍ली. देश आजादी की 68वीं वर्षगांठ का जश्न मना रहा है। ये 15 अगस्त इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश में बदलाव हुआ है। भाजपा की अगुआई में राजग सरकार ने देश की बागडोर संभाली है। इस सरकार से लोग तमाम तरह की उम्मीदें लगाए बैठे हैं। दरअसल, लंबे समय से देश में निराशा का माहौल रहा है। लोगों को लग रहा था कि सिस्टम कुछ नहीं कर रहा है पर अब नई सरकार के बाद सकारात्मक बदलावों की एक आस जगी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहली बार लालकिले की प्राचीर से देश को संबोधित करेंगे। उन्होंने अपने चुनावी अभियान के दौरान देशवासियों में जो उम्मीदें जगाई थी उन्हें वे कैसे पूरा करेंगे इसका खाका जरूर लालकिले से सुनाईदेगा। राष्ट्रपति के अभिभाषण पर लोकसभा में अपने पहले उद्बोधन में उन्होंने कहा था कि मतदान होने तक हम उम्मीदवार थे और मतदान होने के बाद हम सब लोगों की उम्मीदों के रखवाले हैं।

इसके लिए उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना होगा। आज भारत इस पर गर्व कर सकता है कि उसने अपनी राजनीतिक स्वतंत्रता बरकरार रखी है पर यह सवाल हर किसी के मन में है कि स्वतंत्रता सेनानियों ने जिस तरह का भारत बनाने का सपना देखा था, क्या इन वर्षों में हम वैसा भारत बना पाए हैं? क्या हमारी व्यवस्था देश के हर नागरिक को शिक्षा, भोजन, रोजगार, समान अवसर, सम्मान और न्याय दे पाने में सफल हो पाई है। वस्तुस्थिति यह है कि आज आजादी के साढ़े छह दशक बाद भी हम उन्हीं बुनियादी सवालों से जूझे रहे हैं, जो छह दशक पहले आजाद भारत के सामने खड़े थे। स्वाधीनता के इस सफर में देश ने निश्चित रूप से ढेर सारी उपलब्धियां हासिल की है, लेकिन इस सत्य से हम मुंह नहीं मोड़ सकते कि चुनौतियों के आगे ये सफलताएं बौनी लगती हैं। आज देश के समक्ष राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक आदि लगभग हर महत्वपूर्ण क्षेत्र में विषम चुनौतियां खड़ी हैं। ये धीरे-धीरे व्यवस्था को खोखला कर रही हैं।

इनसे पार पाना बहुत जरूरी है। आज भी बड़ी आबादी गरीब, अशिक्षित और कुपोषित है। उनके पास स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं हैं। हर साल सरकारें तमाम दावे करती हैं, फिर भी सबको स्वच्छ पेयजल और भोजन उपलब्ध नहीं कराई जा सकी है। आजादी के बाद देश में संविधान का राज स्थापित किया गया है। कहा गया कि कानून की नजर में सभी नागरिक समान होंगे पर आज स्थिति एकदम उल्टी है। रसूखदार लोग अपराध करने के बाद भी खुलआम घूम रहे हैं। वहीं गरीबों को न्याय पाने के लिए दर-दर की ठोकरें खानी पड़ रही हैं। देश में गैर-बराबरी लगातार बढ़ती जा रही है। जाति, धर्म, प्रांत और क्षेत्रवाद के नाम पर राजनीतिक रोटियां सेंकी जा रही हैं।

भाईचारा और बंधुता की भावना को पलीता लगाकर वैमनस्य की भावना जानबूझकर फैलाई जा रही है। लोगों में नैतिक मूल्यों का पतन होने के साथ-साथ निजी हित सवरेपरि हो गए हैं। जो लोग राष्ट्रहित की बात कर रहे हैं, व्यवस्थाएं उनका चरित्र हनन कर खलनायक के तौर पर पेश करने की साजिश में लगी हैं। लोकतंत्र के चार स्तंभ हैं। उनमें से दो, कार्यपालिका और विधायिका के प्रति लोगों में गुस्सा है। न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा है, लेकिन उसमें भी भ्रष्टचार की खबरें परेशान करने वाली हैं। बाजार के दबाव में मीडिया दिग्भ्रमित हो गया है। कहने को तो हम विश्व की पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हैं, पर हकीकत किसी से छिपी नहीं है। देश में भ्रष्टाचार चरम पर है। ऐसे हालातों में यह 15 अगस्त जश्न के साथ-साथ मंथन का भी समय है।

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