Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

कालेधन पर बेनतीजा बहस!

अनुमान है कि विदेशी बैंकों में भारतीय नागरिकों का लगभग 20 खरब डालर (1200 खरब रुपये) जमा हैं।

कालेधन पर बेनतीजा बहस!
विदेशी बेंकों में जमा काला पैसा वापस लाने के मुद्दे पर संसद में जमकर बहस हुई। आरोप-प्रत्यारोप लगे लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला। जनता को लगता है कि अधिकांश बड़े दलों का रवैय्या एक जैसा है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को विदेशी बेंकों में काला पैसा रखने वाले सभी खाताधारकों के नाम चौबीस घंटे के भीतर अदालत में जमा करने का आदेश दिया था। मजबूर सरकार को 627 लोगों की सूची अदालत को सौंपनी पड़ी। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान सरकारी वकील ने काला धन धारकों का नाम न बताने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया था।
भारत सरकार को विदेशों में काला धन रखने वाले लगभग 800 लोगों के नाम र्जमनी, फ्रांस और स्विटजरलैंड की सरकारों से मिले हैं। 2013 में इंटरनेशनल कंसोर्टियम आफ इनवेस्टिगेटिव र्जनलिज्म (आईसीआईजे) ने भी ऐसे 612 लोगों की सूची भारत को सौंपी थी, जिनके काले खाते सिंगापुर और ब्रिटिश वर्जिनिया में हैं। एक मोटे अनुमान के अनुसार स्विटजरलैंड, मारीशस और दुनिया के अन्य टैक्स हैवन देशों में पचास हजार भारतीय नागरिकों के काले खाते हैं। फिलहाल सरकार के पास जो जानकारी है वह ऊंट के मुंह में जीरे जितनी है।
खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि और हमें फॉलो करें ट्विटर पर-
अनुमान है कि विदेशी बैंकों में भारतीय नागरिकों का लगभग 20 खरब डालर (1200 खरब रुपये) जमा हैं। विश्वबैंक और अंतरराट्रीय मुद्रा कोष के अनुसार भारत में हर वर्ष 600 खरब का काला धन पैदा होता है, जिसका दस फीसदी विदेशों में जमा किया जाता है। यह बात भी सबको पता है कि राजनीतिक दलों को जो मोटा चंदा मिलता है, उसमें अधिकांश काला धन होता है। नम्बर दो का पैसा कारपोरेट और अपराध जगत से मिलता है। इसी वजह से राजनीतिक दल और नेता अपने चंदे का स्त्रोत बताने को राजी नहीं हैं। चुनाव व्यवस्था में सुधार के के लिए 1990 में गोस्वामी समिति गठित की गई थी। इसके बाद 1993 में वोहरा समिति तथा 1998 में इन्द्रजीत गुप्त समिति ने चुनाव व्यवस्था में सुधार के लिए सिफारिशें की। ये सभी रिपोर्ट और समस्त सुझाव बरसों से सरकारी दफ्तरों में धूल फांक रहे हैं। मनमोहन सिंह सरकार ने तो इस कानून में फच्चर फंसाने की पूरी तैयारी कर ली थी, किन्तु प्रबल जन विरोध देखकर उन्हें कदम पीछे लेना पड़ा। लोकतंत्र को काले धन से मुक्त कराने के लिए दुनिया के 71 देशों में स्टेट फंडिंग व्यवस्था लागू है। यूरोप के 86, अफ्रीका के 71, अमेरिका के 63 तथा एशिया के 58 फीसदी देशों में प्रत्याशियों के चुनाव लड़ने का खर्चा सरकारी खजाने से दिया जाता है।
भारत में चुनाव को काले धन के कुचक्र से निकालने के लिए चुनिंदा राजनीतिक दल, न्यायविद, शिक्षाविद और सिविल सोसायटी के सदस्य वर्षों से प्रयासरत हैं, लेकिन कुछ बड़े दल और नेता इसके विरोधी हैं। उन्हें लगता है यदि राज्य की मदद मिलने लगी तो चुनाव लड़ने का उनका एकाधिकार समाप्त हो जाएगा। कुछ जागरूक लोग हर पार्टी को प्राप्त वोट प्रतिशत के आधार पर संसद और विधानसभाओं में सीट देने की मांग उठा रहे हैं। एक सुझाव यह भी है कि चुनाव जीतने के लिए किसी भी प्रत्याशी के लिए कम से कम 51 फीसदी वोट पाने की शर्त लागू कर दी जाए।
आजकल 20-25 वोट लेकर ही संसद या विस पहुंच जाते हैं। अच्छे सुझाव तो और भी हैं, लेकिन उन पर अमल के लिए राजनीतिक दलों की आम सहमति जरूरी है। फिलहाल आम सहमति के आसार नजर नहीं आते। ऐसे में काले धन से मुक्ति की कल्पना कैसे की जा सकती है ?
Next Story
Top