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मेक इन इंडिया मुहिम से जगती उम्मीद

मेक इन इंडिया मुहिम की लॉचिंग से स्पष्ट हो गया कि यह नारा नहीं है और न ही सिर्फ निवेशकों को निमंत्रण है।

मेक इन इंडिया मुहिम से जगती उम्मीद
नई दिल्ली. पंद्रह अगस्त को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लालकिले के प्राचीर से जब दुनिया को ‘कम मेक इन इंडिया’ कहा था तब कुछ लोगों ने इसे एक नारा माना था, परंतु बृहस्पतिवार को दिल्ली के विज्ञान भवन में वैश्विक व घरेलू जगत के करीब तीन हजार उद्योगपतियों के बीच ‘मेक इन इंडिया’ मुहिम की लॉचिंग से स्पष्ट हो गया कि यह नारा नहीं है और न ही सिर्फ निवेशकों को निमंत्रण है, बल्कि इसके जरिए मोदी सरकार भारत को मैन्युफैक्चरिंग का हब बनाना चाहती है।
इसके तहत सरकार का उद्देश्य है कि विदेशी कंपनियां भारत आएं और यहां निर्माण करें। बेशक वे अपने उत्पाद कहीं भी बेचने को स्वतंत्र हैं। इससे ना सिर्फ देश में पैसा आएगा, बल्कि रोजगार के मौके भी पैदा होंगे। इसी को ध्यान में रखते हुए सरकार ने रक्षा क्षेत्र में एफडीआई के नियमों में बदलाव कर इसे काफी उदार बनाया है।भारत में मैन्युफैक्चरिंग अभी सिर्फ 15 प्रतिशत है, जिसे 25 प्रतिशत करने की जरूरत है। मैन्युफैक्चरिंग में आगे बढ़े बिना भारत विकसित देशों की कतार में खड़ा नहीं हो सकता है। केंद्र सरकार ने ऐसे 25 महत्वपूर्ण क्षेत्रों की पहचान की है जिनमें भारत दुनिया में अग्रणी स्थिति हासिल करने की क्षमता रखता है, परंतु इसके लिए बड़े पैमाने पर उद्योग-धंधों को स्थापित करना जरूरी है।
प्रधानमंत्री का यह कहना उचित है कि दूसरे देशों में उत्पादन कर भारत में माल बेचने की नीति ज्यादा कारगर नहीं हो सकती, क्योंकि खपत के लिए लोगों के पास क्रय शक्ति भी होनी चाहिए। लिहाजा दुनिया के लिए बेहतर यही होगा कि वे भारत में ही आ कर उत्पादन करें, क्योंकि इससे बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा होगा, जिससे लोगों की क्रय शक्ति बढ़ेगी। इस तरह मांग बढ़ेगी, तो उत्पादन बढ़ेगा। जिससे उद्योगों का विस्तार होगा और फिर अर्थव्यवस्था का विकास होगा। इस तरह गरीबी दूर होगी और मध्यवर्ग का विस्तार होगा। यह उत्पादन कैसा होगा प्रधानमंत्री ने जीरो डिफेक्ट (त्रुटिहीन उत्पाद) और जीरो इफेक्ट (पर्यावरण अनुकूल उद्योग) का जिक्र कर पहले ही स्पष्ट कर दिया है। उन्होंने इस मौके पर एफडीआई की नई परिभाषा देते हुए कहा कि भारतीयों के लिए इसका मतलब होना चाहिए फर्स्ट डिवेलप इंडिया, वहीं विश्व जगत के लिए एफडीआई भारत में एक अवसर की तरह है। वैसे देखा जाए तो उद्योगों के फलने-फूलने के लिए जरूरी संसाधन आज भारत में उपलब्ध हैं। यहां लोकतंत्र है, आबादी में विविधता है और मांग भी मौजूद है।
दुनिया के मुकाबले यहां श्रम भी सस्ता है, परंतु यह तभी संभव हैजब उद्योग जगत को अनुकूल माहौल मिलेगा। इसके बाद ही विदेशी और घरेलू कंपनियां भारत में उद्योग लगाएंगी और उत्पादन करेंगी। किसी भी उद्योग के लिए सबसे बड़ी बाधा होती है नीति और नियमन के नाम पर अड़ंगेबाजी। यह सही है कि देश में कानून का राज होना चाहिए। हालांकि केंद्र में नईसरकार बनने के बाद माहौल बदल रहा है। कारोबार जगत में विश्वास एक बार फिर लौटा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी उद्योग जगत को भरोसा दिलाया है कि उनका पैसा डूबने नहीं दिया जाएगा। इस मौके पर मोदी ने कहा कि बेहतर माहौल देना किसी भी सरकार का दायित्व होता है। उन्होंने यह भी कहा है कि नीतियों का अडंगा उनके सामने नहीं आने दिया जाएगा। उद्योग जगत की सहूलियत के लिए सरकार सिर्फ सुशासन नहीं, बल्कि प्रभावी सुशासन देगी। जाहिर है, यदि ऐसा होता हैतो भारत मैन्युफैक्चरिंग जगत का सिरमौर बन सकता है।
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