Top
Hari bhoomi hindi news chhattisgarh
Breaking

दलबदल पर सवालों के घेरे में हुड्डा सरकार

हजकां को छह सीटों पर जीत मिली थी, जिसमें पार्टीअध्यक्ष कुलदीप बिश्नोई भी एक थे।

दलबदल पर सवालों के घेरे में हुड्डा सरकार

दलबदल कानून के तहत पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा जनहित कांग्रेस (हजकां) बीएल के पांच विधायकों की सदस्यता रद्द कर दी है। अदालत ने माना है कि दलबदल का उनका तरीका अवैध था। यह मामला साल 2009 का है जब चुनाव के बाद 90 विधानसभा सीटों वाली हरियाणा विधानसभा में कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। हालांकि निर्दलीय विधायकों के समर्थन होने का उसने दावा किया था। फिर भी राज्य विधायकों की जोड़तोड़ और खरीद फरोख्ता का गवाह बना था। हजकां इसकी शिकार बनी थी और कुलदीप बिश्नोई को छोड़ उसके पांचों विधायक टूटकर कांग्रेस का दामन थाम लिए थे।

दरअसल, हजकां को छह सीटों पर जीत मिली थी, जिसमें पार्टीअध्यक्ष कुलदीप बिश्नोई भी एक थे। पांचों विधायकों ने दावा किया कि उन्होंने हजकां को ही कांग्रेस में विलय कर दिया है। जबकि कानून के अनुसार किसी एक पार्टी को दूसरी पार्टी में विलय के लिए उस पार्टी के अध्यक्ष की सहमति जरूरी होती है। उस घटना के बाद हजकां अध्यक्ष कुलदीप बिश्नोई ने पांचों विधायकों के खिलाफ दलबदल कानून के तहत विधानसभा अध्यक्ष के पास याचिका दायर कर इनकी सदस्यता रद्द करने की मांग की थी, लेकिन उन्होंने भी एक तो इस मामले को लंबे समय तक लटकाए रखा और बाद में दबाव बढ़ता देख गत वर्ष इस विलय को सही ठहरा दिया था। विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले पर कुलदीप बिश्नोई ने आपत्ति जताई और मामले को पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट में ले गए थे, जिसमें कोर्ट ने अंतिम फैसला सुनाया है। इस प्रकार हरियाणा में साल 2009 में भूपेंद्र सिंह हुड्डा की अगुआई में कांग्रेस की सरकार बनी और पांच सालों तक चल भी गई।

अब कुछ ही दिनों बाद 15 अक्टूबर को चुनाव होने हैं और 19 अक्टूबर को नतीजे भी आ जाएंगे। मौजूदा विधानसभा का कार्यकाल 27 अक्टूबर को समाप्त हो रहा है। उससे पहले राज्य में नई सरकार का गठन हो जाना है। लिहाजा, इन दिनों राज्य चुनावी रंग में रंगा हुआ है। अब इस फैसले से एक बात स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री हुड्डा ने गलत तरीके से अपनी सरकार बनाई थी। इसमें विधायकों की खरीद फरोख्त से भी इंकार नहीं किया जा सकता। इनमें से कईविधायकों को तो मंत्री पद भी दिया गया था। इस फैसले के बाद कई सवाल खड़े होते हैं। अयोग्य विधायकों के साथ पांच सालों तक चली सरकार के सारे फैसले कितने वैध माने जाएंगे? क्योंकि यह एक तरह से गलत तरीके से सरकार चलाने का भी मामला बनता है।

लिहाजा, पूरी सरकार की वैधानिकता पर भी अब सवाल खड़े होते हैं। अयोग्य मंत्रियों ने जो फैसले लिए हैं या कार्य किए हैं, वे कितने जायज कहे जा सकते हैं? वहीं यह फैसला इस तथ्य को पूरी तरह चरितार्थ कर रहा हैकि समय से न्याय नहीं मिलना भी एक तरह से अन्याय ही है। क्योंकि अब 2014 में इस फैसले के क्या मायने रह जाएंगे? क्योंकि सरकार तो अब चल गई है। लिहाजा, जिन पर भी इस तरह के मामले निबटाने की जिम्मेदारी होती है उनसे यह प्रश्न पूछा जाना चाहिए कि फैसले आने में इतनी देरी क्यों हो रही है? न्यायतंत्र की इस समस्या पर भी गंभीरता से सोच विचार करने की काफी जरूरत है।

खबरों की अपडेट पाने के लिए लाइक करें हमारे इस फेसबुक पेज को फेसबुक हरिभूमि और हमें फॉलो करें ट्विटर पर-

Next Story
Top