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सुप्रीम कोर्ट के पटल पर न्याय की भाषा का प्रश्न

सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर मांग की गई है कि अदालतों के कामकाज की आधिकारिक भाषा हिंदी को बनाई जाए।

सुप्रीम कोर्ट के पटल पर न्याय की भाषा का प्रश्न
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सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर मांग की गई है कि अदालतों के कामकाज की आधिकारिक भाषा अंग्रेजी की बजाय हिंदी को बनाई जाए। इस संबंध में सुप्रीम कोर्ट ने गृह मंत्रालय और कानून मंत्रालय सहित राज्यों को भी नोटिस जारी कर पूछा हैकि इस पर उनकी क्या राय है। इस मुद्दे पर पूरे देश में चर्चा स्वाभाविक है। दरअसल, याचिका में तर्क दिया गया है कि मुकदमे से जुड़े करीब 90 फीसदी लोगों को अंग्रेजी समझ में नहीं आती है, लिहाज उस भाषा में लिखे फैसले की तासीर भी वे समझ नहीं पाते हैं। बस उनके वकील से इतना ही पता चल पाता है कि मुकदमे में उनकी जीत हुई है या हार। जाहिर है, यह न्याय की मूल भावना के खिलाफ है। यदि एक फांसी की सजा प्राप्त मुजरिम सिर्फ भाषा की समस्या के कारण यह न समझ पाए कि अदालत ने उसको वह सजा किन तथ्यों और प्रक्रियाओं के आधार पर दी है तो यह न्याय व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों के ही उलट है। अदालतों की भाषा के संबंध में संविधान के अनुच्छेद 349 में कहा गया है कि सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में अंग्रेजी ही आधिकारिक भाषा होगी अर्थात कामकाज अंग्रेजी में ही होंगे। हालांकि अंग्रेजी को बनाए रखने की व्यवस्था सिर्फ स्वतंत्र भारत के शुरुआती 15 वर्षों के लिए की गई थी। यह कहा गया था कि इसके बाद संसद संविधान में संशोधन कर इसके लिए कानून बना सकती है, लेकिन अब तक इस दिशा में कुछ भी नहीं किया गया है। और ऊंची अदालतों में अंग्रेजी की प्रमुखता बनी हुई है। हालांकि उसी अनुच्छेद में यह भी कहा गया है कि किसी भी राज्य के राज्यपाल अपने यहां के हाईकोर्ट में हिंदी या स्थानीय भाषा के इस्तेमाल का आदेश दे सकते हैं पर अभी तक किसी राज्यपाल ने इस तरह का कदम नहीं उठाया है। हालांकि निचली अदालतों में बहस के दौरान हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं का खूब इस्तेमाल होता है, परंतु फैसले अंग्रेजी में ही लिखे जाते हैं। अब यह मामला सुप्रीम कोर्टमें आया है तो बेहतर होगा कि किसी उचित निर्णय पर पहुंचा जाए। क्योंकि न्याय त्वरित और गुणवत्तापूर्ण होने के साथ आसान अर्थात मुकदमे से जुड़े लोगों की समझ में आने वाली भाषा में भी होना चाहिए। इस प्रकार संविधान में वर्णित भाषाओं में भी लोगों को न्याय मिलना चाहिए। जब सांसदों के दिए भाषणों को संविधान में वर्णित सभी 22 भाषाओं में तुरंत अनुवाद की व्यवस्था है तो अदालतों में इस तरह की व्यवस्था करने पर क्यों नहीं सोची जा सकती है? मसलन हिंदी भाषी राज्यों में हिंदी या पश्चिम बंगाल में बांग्ला में बहस और फैसले क्यों नहीं दिए जा सकते? ऐसी ही व्यवस्था दूसरे राज्यों में की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट में भी ऐसी व्यवस्था की जा सकती है। हालांकि यह तर्क दिया जाता हैकि कानून की किताबें अंग्रेजी में हैं, कानून की पढ़ाई अंग्रेजी में होती है, संसद में कानून अंग्रेजी में बनते हैं और अंग्रेजी के शब्द कानून विषय की बेहतर ढंग से व्याख्या करते हैं। साथ ही हिंदी या दूसरी भाषाओं में कानून की शब्दावली का अभाव है। विधि आयोग ने हिंदी में करीब बीस हजार कानूनी शब्दावली तैयार की है, परंतु वे बहुत ही कठिन हैं। जाहिर है, इसकी शब्दावली अभी और आसान बनानी होगी। हालांकि पूर्व में इसी तरह की एक याचिका को दिल्ली हाईकोर्ट ने खारिज कर दिया था। अब देखना हैकि सुप्रीम कोर्ट किस नतीजे पर पहुंचता है।
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