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चिंतन: हाईस्पीड ट्रेन जरूरी पर चुनौतियां भी कम नहीं

यह सही है कि हाईस्पीड और बुलेट ट्रेनें हमारी जरूरत हैं।

चिंतन: हाईस्पीड ट्रेन जरूरी पर चुनौतियां भी कम नहीं
देश की पहली हाईस्पीड ट्रेन का बृहस्पतिवार को पहला परीक्षण सफल रहा। 160 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से चलने वाली इस ट्रेन ने नई दिल्ली से आगरा की 195 किलोमीटर तक की दूरी को निर्धारित समय नब्बे मिनट की बजाय सौ मिनट में पूरी कर ली। रेलवे के अनुसार ट्रेन से जुड़े कुछ और परीक्षण होने हैं। यदि वे परीक्षण पूरी तरह सफल रहे तो इस बार के रेल बजट में इस ट्रेन की घोषणा हो सकती है और फिर नवंबर से दिल्ली-आगरा के बीच इस ट्रेन की औपचारिक शुरुआत भी हो सकती है।
फिलहाल भोपाल शताब्दी एक्सप्रेस अधिकतम 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चल कर 120 मिनट में दिल्ली से आगरा पहुंचाती है। यह सही है कि हाईस्पीड और बुलेट ट्रेनें हमारी जरूरत हैं। भारत बड़ा देश होने के साथ-साथ बड़ी आबादी वाला देश है। अब पैसेंजर और एक्सप्रेस ट्रेनें अपने गंतव्य स्थान पर जल्दी पहुंचने वालों के लिए उतनी मुफीद नहीं रह गई हैं। वहीं जो लोग रेलवे से यात्रा करते हैं उनकी जेब उन्हें इस बात की अनुमति भी नहीं देती कि वे हवाई जहाज की यात्रा कर सकें। हालांकि हवाई यात्रा की पहुंच भी उतनी नहीं है जितनी की ट्रेनों की है।
भारतीय ट्रेन को जीवन रेखा मानी जा सकती है जो दक्षिण से उत्तर व पूर्व से पश्चिम को जोड़ती है लेकिन इसकी बदहाली किसी से छिपी हुई नहीं है। बुलेट ट्रेन चलाने का सपना देख रहे भारतीय रेलवे के सामने कई बड़ी चुनौतियां हैं, जैसे- 64 हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबे ट्रैक में से केवल 15 प्रतिशत ही ऐसे हैं जो हाईस्पीड ट्रेनों की तेज रफ्तार को झेल सकते हैं। वहीं आए दिन होती दुर्घटनाएं, ट्रेन व स्टेशनों पर गंदगी, समय का कोई हिसाब किताब नहीं होना, बदहाल स्थिति में ट्रैक, बड़ी संख्या में मानव रहित क्रॉसिंग जो कि बड़ी संख्या में दुर्घटनाओं का कारण बनते हैं और बहुत सारी रूटों पर यात्रियों की संख्या के अनुरूप ट्रेन और कोच की अनुपलब्धता, टिकट आरक्षण में भ्रष्टाचार, सालों तक किरायों में वृद्धि नहीं होने की वजह से दिवालियापन जैसी स्थिति, हजारों परियोजनाओं का लटका होना और सेफ्टी व सुरक्षा का पूर्णतया अभाव कई गंभीर प्रश्न खड़ा करने के साथ ही जर्जर रेलवे की हकीकत बयां कर रहे हैं।
सबसे पहली जरूरत यह है कि रेलवे की इन बुनियादी समस्याओं को दूर कर यात्रियों को बेहतर सुविधाएं दें। फिर इसके बाद हाईस्पीड ट्रेन के बारे में योजना बनाएं और सोचें। सामान्य ट्रेनों के लिए प्रति एक किलोमीटर ट्रैक बिछाने पर तीन करोड़ रुपये का खर्च आता है जबकि बुलेट ट्रेन का ट्रैक बिछाने पर प्रति किलोमीटर सात करोड़ तक की लागत आती है। जिस तरह के यहां हालात हैं उनमें जब तक हम ट्रैक के दोनों तरफ सुरक्षा बाड़ नहीं लगाएंगे तब तक बेहिसाब दुर्घटनाओं की संभावना बनी रहेगी। ये अपने आप में बड़ा खर्च होगा। कुल मिलाकर इसके लिए बड़े पैमाने पर पैसा, जमीन और वक्त चाहिए। किसी एक-दो रूट पर ट्रेनों की रफ्तार बढ़ाने से भला होने वाला नहीं है। यदि आगरा जैसे पर्यटन स्थलों को दिल्ली से या प्रमुख शहरों से जोड़ा जाता है तो यह स्वागतयोग्य कदम है पर सभी लंबी रूटों पर सुरक्षा मानदंडों को अपनाते हुए ट्रेनों की गति बढ़ाईजाए तो यह एक सही दिशा में कदम होगा।

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