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गठबंधन राजनीति की दिशा तय करेंगे नतीजे

हरियाणा में विनोद शर्मा और गोपाल कांडा ने तो अपनी पार्टी ही बना ली।

गठबंधन राजनीति की दिशा तय करेंगे नतीजे

नईदिल्ली.हरियाणा में 1351 और महाराष्ट्र में 4119 उम्मीदवारों की किस्मत इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में बंद हो गई। अब 19 अक्टूबर को मतगणना के नतीजे इन राज्यों की राजनीति के साथ ही केंद्र की राजनीति की भी दिशा तय करने का काम करेंगे। मई में संपन्न हुए 16वीं लोकसभा चुनावों के बाद पहली बार राज्यों के विधानसभा चुनाव हुए हैं। छिटपुट घटनाओं को छोड़ दें तो मतदान कुल मिलाकर शांतिपूर्ण रहा। इस बार भी दोनों राज्यों में भारी मतदान हुआ है। हरियाणा में पिछली बार का रिकॉर्ड टूट गया।

वर्ष 2009 के विधानसभा चुनावों में हरियाणा और महाराष्ट्र में क्रमश: 72.35 और 60 फीसदी कुल मतदान हुए थे। महाराष्ट्र में जहां कांग्रेस-एनसीपी 15 वर्षों से सत्ता में थी, वहीं हरियाणा में 10 साल से कांग्रेस की सरकार है। दोनों राज्यों के सियासी माहौल में कांग्रेस सरकार के खिलाफ एंटी-इनकंबेंसी एक कॉमन फैक्टर है। इसके साथ ही महाराष्ट्र में कुशासन, भ्रष्टाचार और किसानों की आत्महत्या तथा हरियाणा में शासन के भेदभाव, बेरोजगारी और पानी का मुद्दा हावी रहा। इनकारणों से जनता भी बदलाव के मूड में दिख रही है।

भाजपा ने विकास और सुशासन के नाम पर लोगों से जनाधार मांगा। बहरहाल, अरसे बाद ऐसा देखने को मिला है कि इन राज्यों में कोई गठबंधन नहीं है। जहां महाराष्ट्र में भाजपा और शिवसेना के बीच जहां 25 वर्षों का गठबंधन टूट गया, वहीं कांग्रेस और एनसीपी के 15 वर्षों का साथ भी छूट गया। हरियाणा में भी भाजपा और हजकां के बीच गठबंधन था पर चुनाव से पहले ही हजकां ने अपनी राह अलग कर ली। महाराष्ट्र में जहां भाजपा, शिवसेना, कांग्रेस, एनसीपी और मनसे मुकाबले में हैं, वहीं हरियाणा में भाजपा, आईएनएलडी, कांग्रेस और हजकां।

यद्यपि चुनाव पूर्व हुए सभी ओपिनियन पोल और राजनीतिक विश्लेषक यही इशारा कर रहे हैं कि दोनों राज्यों में भाजपा बड़ी पार्टी बन कर उभरेगी। महाराष्ट्र में शिवसेना दूसरे नंबर पर हो सकती है और हरियाणा में आईएनएलडी के दूसरे नंबर पर रहने का अनुमान है। लिहाजा, चुनाव के नतीजे यह बात भी साबित करेंगे कि क्या राज्यों में गठबंधन की राजनीति का दौर खत्म हो गया है या अभी और इंतजार करने की जरूरत है। यह चुनाव प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की धुआंधार प्रचार के लिए भी याद किया जाएगा।

दोनों राज्यों में भाजपा का एकमात्र चेहरा वही रहे। क्योंकि दोनों राज्यों में पार्टी ने चुनाव से पहले मुख्यमंत्री उम्मीदवार का नाम घोषित नहीं कियाहै। दस दिनों में 38 रैलियां उन्होंने जिस तरह से की उससे यह चुनाव मोदी बनाम अन्य में तब्दील हो गया। इसके अलावा यह चुनाव इस बात का भी गवाह बना हैकि दोनों राज्यों में सत्ता में रही कांग्रेस किस तरह से चुनाव पूर्व ही हथियार डाल दी थी। कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व चुनावों से एक तरह से दूर ही रहा। सोनिया और राहुल गांधी दोनों ने मिलकर कुल 16 रैली की। पार्टी भूपेंद्र सिंह हुड्डा तथा पृथ्वीराज चव्हाण पर निर्भर रही।

ऐसा लग रहा था कि कांग्रेस यह मानकर चल रही है कि नतीजे उसके खिलाफ आने वाले हैं। लोकसभा में मिली करारी हार का अभी भी पार्टी को सदमा है। वहीं कांग्रेस के कई दिग्गज भाजपा और दूसरे दलों में शामिल हो गए। हरियाणा में विनोद शर्मा और गोपाल कांडा ने तो अपनी पार्टी ही बना ली। मतदान प्रतिशत देखकर एक बात तो कही जा सकती है कि जनता ने परिवर्तन के लिए मतदान किया है। अब सबको नतीजों का इंतजार है। हालांकि इस चुनाव को केंद्र में मोदी सरकार के कामकाज के प्रति जनमत संग्रह मानना उचित नहीं है। हां, नतीजों से यह पता चलेगा कि नरेंद्र मोदी का जादू पांच महीने बाद भी बरकरार है या नहीं?

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