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फांसी को खत्म करने का समय अभी नहीं आया है

देश के कानून में जब तक मौत की सजा का प्रावधान रहेगा अदालतें मृत्युदंड देती रहेंगी।

फांसी को खत्म करने का समय अभी नहीं आया है
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विधि आयोग द्वारा आतंकवाद और देशद्रोह को छोड़कर सभी मामलों में फांसी की सजा को खत्म करने की सिफारिश करने के बाद देश में मृत्युदंड को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। हालांकि इस पर अंतिम फैसला सरकार को लेना है और अभी यह कहना कठिन है कि फांसी की सजा पर उसका क्या नजरिया होगा। बहरहाल, देखा जाए तो यह सिफारिश इस सजा पर चल रही बहस को किसी नतीजे पर पहुंचा सकती है। आज दुनिया के देश एक-एक कर अपने यहां से फांसी की सजा को खत्म कर रहे हैं, लेकिन भारत अमेरिका और चीन सहित उन 58 देशों में शामिल है जहां इस तरह की सजा का प्रावधान है। देश के कानून में जब तक मौत की सजा का प्रावधान रहेगा अदालतें मृत्युदंड देती रहेंगी।

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सुप्रीम कोर्ट ने अपने दिशा निर्देश में साफ कहा हैकि दुर्लभ से दुर्लभतम मामले में ही किसी दोषी को फांसी की सजा दी जानी चाहिए। वैसे भी फांसी की सजा को लेकर सुप्रीम कोर्ट काफी सावधानी बरतता रहा है। किसी बेगुनाह को यह सजा नहीं मिल सके इसके लिए भारतीय न्यायतंत्र में कई प्रावधान किए गए हैं। गत दिनों विधि आयोग की मदद से नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, दिल्ली ने 2000 से लेकर 2015 के दौरान देश में विभिन्न अदालतों द्वारा दी गई फांसी की सजा का अध्ययन करने के बाद कहा था कि इन पंद्रह सालों में देश के ट्रायल कोर्ट से 1617 लोगों को मौत की सजा मिली, जबकि उच्च न्यायालयों और सुप्रीम कोर्ट में इस तरह की सजा की दर ट्रायल कोर्ट के मुकाबले कम रही। यानी जब मामले ऊपरी अदालतों में गए तो हाई कोर्ट ने 17.5 फीसदी फांसी की सजा को ही जारी रखा और वहीं सुप्रीम कोर्ट ने तो सिर्फ 4.9 फीसदी फांसी की सजा को ही बरकरार रखा। बहुत से फांसी की सजा पाए अभियुक्तों को या तो बरी कर दिया गया या उनकी सजा आजीवन कारावास में तब्दील हो गई।

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हाल की घटनाओं पर नजर दौड़ाएं तो पाते हैं कि उन्हीं को फांसी हुई है जो आतंकी या बर्बरतम घटनाओं में शामिल रहे। इससे प्रतीत होता है कि फांसी की सजा को लेकर कोर्ट कितना सजग है। हालांकि स्वयं विधि आयोग के सदस्य भी फांसी की सजा को लेकर एकमत नहीं हैं, लेकिन यह महत्वपूर्णहै कि उसने इस सजा को पूरी तरह खत्म करने की सिफारिश नहीं की है। आतंकवाद और देशद्रोह के मामलों में फांसी की सजा को बरकरार रखना उचित है क्योंकि ये दोनों मामले राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़े हैं। आज भारत आतंकवाद के निशाने पर है। आतंकी वारदातों में हो रही वृद्धि को देखते हुए मौत की सजा को समाप्त करना ठीक नहीं होगा। हालांकि कुछ लोग तर्क दे रहे हैं कि जो आतंकी मरने मारने पर उतारू हों, उन्हें फांसी की सजा नहीं रोक सकती, लेकिन सिर्फ इसी आधार पर उन्हें फांसी की सजा से मुक्त कर दिया जाए यह भी उचित नहीं है। यह सही हैकि भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और एक सभ्य समाज को बदले की भावना के सिद्धांत का सर्मथन नहीं करना चाहिए, लेकिन एक सभ्य समाज आतंकी बर्बरताओं को भी सहन नहीं कर सकता। लिहाजा जब तक आतंकवाद के खतरे हमारे सामने हैं, तब तक इसे खत्म करना ठीक नहीं होगा।

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