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चिंतन: आंदोलनों में राष्ट्रीय संपत्ति को नष्ट करना जायज नहीं

हरियाणा रोडवेज की 36 बसें और 18 पुलिस थाने फूंक दिए गए।

चिंतन: आंदोलनों में राष्ट्रीय संपत्ति को नष्ट करना जायज नहीं
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ताजा जाट आंदोलन के दौरान हरियाणा को हुए भारी नुकसान के बीच सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी संपत्ति के विनाश पर सख्त नाराजगी जताई है। शीर्ष अदालत ने हार्दिक पटेल मामले की सुनवाई के दौरान कहा कि विरोध प्रदर्शन के नाम पर किसी को भी सरकारी संपत्ति को नष्ट करने का हक नहीं है। सर्वोच्च कोर्ट ने कहा कि न ही किसी व्यक्ति को, न ही किसी संगठन को और न ही किसी राजनीतिक दल को यह हक है कि वह राष्ट्र की संपत्ति को बर्बाद करे। विरोध जताने का यह तरीका कतई स्वीकार्य नहीं है। देश को जलाने की अनुमति किसी को नहीं दे सकते। किसी को भी पूरे तंत्र को ठप करने का अधिकार नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने सलाह भी दी कि देश की संपत्ति को नुकसान पहुंचाने वालों के खिलाफ अनिवार्य रूप से कठोर कार्रवाई की जानी चाहिए और सरकार इस बाबत एक गाइडलाइन जारी करे, जिसमें विरोध के दौरान संपत्ति को क्षति पहुंचाने वाले दंड स्वरूप नुकसान की भरपाई करे। सुप्रीम कोर्ट की यह नाराजगी जायज है। हार्दिक पटेल ने गुजरात में आरक्षण आंदोलन के दौरान अहमदाबाद, बड़ौदा, सूरत में बड़े पैमाने पर देश की संपत्ति को तहस-नहस किया था। गुजरात को हजारों करोड़ का नुकसान हुआ था। अब ठीक हरियाणा में जाट आरक्षण आंदोलन के दौरान सरकारी समेत प्रदेश की संपत्ति को भारी क्षति पहुंचाई गई है। उद्योग संगठन एसोचैम के मुताबिक हरियाणा में बीस हजार करोड़ रुपये और दूसरे अनुमानों के मुताबिक 34 हजार करोड़ रुपये की संपत्ति नष्ट कर दी गई है। हरियाणा रोडवेज की 36 बसें और 18 पुलिस थाने फूंक दिए गए। रोहतक और भिवानी में सबसे अधिक मॉल-शोरूम-दुकानें समेत निजी संपत्ति को भी बर्बाद किया गया। सब आंदोलन के नाम पर। गुजरात व हरियाणा को उबरने में वर्षों लग जाएगा। देश के अनेक हिस्से में अलग-अलग मांगों को लेकर विरांध प्रदर्शन व आंदोलन चलते रहते हैं, लेकिन इसको करने वाले समझते नहीं कि विरोध के दौरान संपत्ति को नष्ट करने की प्रवृत्ति से सरकार के साथ-साथ हजारों लोगों के निवाले छिन जाते हैं, उनकी जीविका समाप्त हो जाती है। बीमा कंपनियों को भी भारी घाटा उठाना पड़ता है। जबकि विरोधियों के पास शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन करने अवसर होता है। महात्मा गांधी और अण्णा हजारे का आंदोलन अहिंसक व शांतिपूर्ण विरोध-प्रदर्शन का बड़ा उदाहरण है। महात्मा गांधी अपने उसूल के इतने पक्के थे कि उनके आजादी आंदोलन के दौरान चोरा-चौरी में हिंसा हो जाने के चलते उन्होंने आंदोलन ही वापस ले लिया था। म्यांमार में आंग सान सू की और दक्षिण अफ्रीका में नेल्सन मंडेला ने भी शांतिपूर्ण आंदोलन किया था। विरोध प्रदर्शन करने वाले नेताओं को गांधी, मंडेला, सू की और अण्णा आंदोलनों से सबक लेना चाहिए। आंदोलन में तोड़-फोड़, उपद्रव, आगजनी व हत्या को हथियार बनाने वालों को भतिभांति समझना चाहिए कि हिंसा किसी भी समस्या का समाधान नहीं है। आंदोलन ने नाम पर राष्ट्र को क्षति पहुंचाना खुद का नुकसान करने के सामान है। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट की चिंता को हिंसक आंदोलन करने वाले लोग समझेंगे।

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