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भ्रष्टाचार के मोर्चे पर देश के लिए अच्छी खबर

पिछले साल भारत को इसमें 94वें स्थान पर रखा गया था।

भ्रष्टाचार के मोर्चे पर देश के लिए अच्छी खबर

दुनियाभर में भ्रष्टाचार पर नजर रखने वाली अंतरराष्ट्रीय एजेंसी ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल द्वारा हर साल जारी होने वाले 175 देशों के ग्लोबल करप्शन इंडेक्स (सीपीआई) में भारत को इस साल 85वें स्थान पर रखा गया है। पिछले साल भारत को इसमें 94वें स्थान पर रखा गया था। इसका अर्थ है कि 2013 के मुकाबले 2014 में देश में भ्रष्टाचार कम हुआ है। दूसरे शब्दों में, भ्रष्टाचार के मामले में दुनिया में भारत की छवि पिछले एक साल में थोड़ी सुधरी है। भ्रष्ट देशों की सूची में भारत की स्थिति में यह सुधार सिर्फ दो जगहों से आए आंकड़ों के आधार पर हुआ है जिसमें एक है, वर्ल्ड इकॉनोमिक फोरम तो दूसरा है, वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट। वर्ल्ड इकोनोमिक फोरम ने भारत में कारोबार को लेकर भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी की धारणा में सुधार को लेकर बेहतर अंक दिए हैं। वहीं वर्ल्ड जस्टिस प्रोजेक्ट ने स्वीकार किया है कि केंद्र में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार के आने के बाद भारत में सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार की धारणा कमजोर हुई है। इन आंकड़ों से देश के लोगों को थोड़ी राहत जरूर मिली होगी।

पिछले दो-तीन सालों में देश ने देखा कि यूपीए के कार्यकाल में किस तरह घोटालों की बाढ़-सी आ गई थी। जिसके कारण संसद से लेकर सड़क तक कई आंदोलन हुए। देश में बढ़ते भ्रष्टाचार को दूर करने के लिए दिल्ली भी दो बड़े आंदोलनों की गवाह बनी, जिसमें कालेधन को लेकर बाबा रामदेव और लोकपाल कानून के गठन की मांग को लेकर अण्णा हजारे का आंदोलन प्रमुख था। भ्रष्टाचार के मुद्दे पर ही आम आदमी पार्टी का गठन हुआ। चौतरफा दबाव के बाद भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए आखिरकार संसद ने भी चार दशक से चली आ रही मांग को पूरा करते हुए लोकपाल कानून बना दिया। तमाम धरना प्रदर्शनों के बीच कुछ रसूखदार लोगों की गिरफ्तारियां भी हुईं, जिनके नाम घोटाले में आए थे। वहीं गत लोकसभा चुनाव में भ्रष्टाचार एक अहम मुद्दा बना था।

मई में देश की राजनीति ने करवट बदली और तीस साल बाद केंद्र में एक बार फिर पूर्ण बहुमत वाली सरकार बनी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपनी सरकार व नौकरशाही को पारदर्शी व जवाबदेह बनाए रखने के लिए कई अहम कदम उठाए हैं, जिनके सकारात्मक प्रभाव सामने आने लगे हैं। हालांकि अभी दूसरी जगहों पर हालात में ज्यादा फर्क देखने को नहीं मिल रहा है। देश में कई स्तरों पर भ्रष्टाचार का बोलबाला बना हुआ है, लेकिन फिर भी यदि ट्रांसपरेंसी इंटरनेशनल जैसी बाहरी संस्था देश में भ्रष्टाचार में कमी के संकेत देख रही है तो यह उत्साह बढ़ाने वाली बात है। इसका साफ अर्थ है कि भ्रष्टाचार का मोर्चा कठिन भले हो पर इसके खिलाफ लड़ाई जीतना नामुमकिन भी नहीं है। इसमें दो राय नहीं कि भ्रष्टाचार के कैंसर को खत्म करना खासी मुश्किल वाला काम है, लेकिन उपाय आगे बढ़ने में ही है, समस्याओं का वास्ता देकर बैठे रहने में नहीं। यह भी ध्यान रहे कि भ्रष्टाचार को सिर्फ संसद में कानून बनाकर नहीं मिटाया जा सकता है, न ही यह किसी एक नेता के बस की बात है। न्यायपालिका, मीडिया सहित शासन की तमाम संस्थाओं की सक्रियता के अलावा जागरूक जनता को भी इसमें सबसे बड़ी भूमिका निभानी होगी।

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