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डेढ़ दशक बाद गीता को मिला अपना वतन

दोनों देशों की सरहदें इतनी जुड़ी हुई हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि कब वे पड़ोसी देश की जमीन पर पहुंच गए।

डेढ़ दशक बाद गीता को मिला अपना वतन

नई दिल्ली. करीब डेढ़ दशक पहले दुर्घटनावश सीमा पार करके पाकिस्तान चली गई मूक-बधिर भारतीय लड़की गीता भारत लौट आई है। वह बोलती नहीं है, लेकिन बिना बोले ही उसने दोनों देशों के कटु रिश्तों में मधुरता के तार छेड़ दिए हैं। उसके पाकिस्तान से भारत आने के दरम्यान जिस तरह का भावनात्मक माहौल बना है, उसे देखकर यह सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि दोनों देशों के लोगों के बीच कितना गहरा लगाव है, लेकिन कुछ कट्टरपंथियों की नापाक मंशा ने दूरियां काफी बढ़ा दी है।

बताया जाता है कि चौदह साल पहले पाकिस्तान रेंर्जस के जवानों को लाहौर रेलवे स्टेशन पर खड़ी समझौता एक्सप्रेस में गीता अकेली बैठी मिली थी तब उसकी उम्र महज सात या आठ साल रही होगी। उन्होंने उसे एदी फाउंडेशन को सौंप दिया। पाकिस्तान में यह संस्था खोए या अपने परिवार से बिछड़े हुए बच्चों को उनके परिवार से मिलवाले और देखरेख का काम करती है, लेकिन गीता चूंकि बोलती नहीं है, लिहाजा उसके मां-बाप के बारे में पता लगाना कठिन होता गया। बाद में गीता को एदी फाउंडेशन की बिलकिस एदी ने अपना लिया और उसे लेकर वह कराची में रह रही थीं।

इसी बीच बजरंगी भाईजान फिल्म आई जिसके बाद गीता सुर्खियों में आ गई। दरअसल, इस फिल्म की कहानी गीता से काफी मिलती जुलती है। बस फर्क इतना है कि गीता भारतीय लड़की है जबकि उस फिल्म का पात्र पाकिस्तानी लड़की है। दोनों देशों में इस फिल्म को देखने के बाद मीडिया और सामाजिक संगठन गीता की समस्या को लेकर काफी मुखर हुए। इसके बाद भारत सरकार भी सक्रिय हो गई।

विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने स्वयं की देखरेख में गीता की देश वापसी की मुहिम में जुट गई। जब यह मामला सामने आया तो कई परिवारों ने गीता को अपनी खोई हुई बेटी होने का दावा किया, लेकिन भारत आने के बाद उसने इनमें से किसी की भी पहचान अपने परिवार के रूप में नहीं की है। हालांकि केंद्र सरकार ने फैसला किया है कि वह मौजूदा परिवारों के डीएनए जांच करा कर देखेगी कि उनके डीएनए गीता से मेल खाते हैं या नहीं। यदि किसी से उसका डीएनए नहीं मिलता है तो केंद्र सरकार उसकी जिम्मेदारी उठाएगी। बहरहाल, गीता की तरह ही ढेर सारे लोग गलती से सीमा पार कर एक दूसरे देशों में प्रवेश कर जाते हैं।

दोनों देशों की सरहदें इतनी जुड़ी हुई हैं कि उन्हें पता ही नहीं चलता कि कब वे पड़ोसी देश की जमीन पर पहुंच गए। मछुआरे हों या सीमावर्ती क्षेत्र के लोग अकसर उन्हें ऐसी समस्याओं से दो चार होना पड़ता है। भारत-पाकिस्तान के बीच जिस तरह के तल्ख रिश्ते हैं, उसमें उनकी गलती बहुत भारी पड़ जाती है। उनकी वापसी महीनों या सालों बाद हो पाती है। बहुतेरे लोग जो खुशकिस्मत नहीं हैं वे दशकों तक जेलों में बंद रहते हैं। भारत के सरबजीत का चेहरा अभी भी जेहन में ताजा है, जिसकी जिंदगी पाकिस्तान की जेल में खप गई। जाहिर है, ऐसे बेगुनाह लोगों की जल्द से जल्द वतन वापसी संभव हो सके इसके लिए भारत-पाकिस्तान को मिल बैठकर कारगर उपाय करने चाहिए। इस संबंध में गीता दोनों को एक रास्ता दिखा रही है।

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