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चिंतन: बेटियों के प्रति मध्ययुगीन बर्बरता से उबरना जरूरी

बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनावत ने भी खुद के बारे में खुलासा किया है कि जब वह पैदा हुई थीं, तब उनके पैरेंट्स नाखुश थे।

चिंतन: बेटियों के प्रति मध्ययुगीन बर्बरता से उबरना जरूरी
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हम कितनी भी नैतिक बातें कर लें, कितने भी कानून बना लें, लेकिन बेटियों के प्रति हम कितने निष्ठुर हैं, इसका पता इससे चलता है कि एक चीनी दंपति ने महज आईफोन खरीदने के लिए अपनी 18 दिन की बेटी को साढ़े तीन हजार अमेरिकी डालर (23000 यूआन, चीनी मुद्रा) में बेच दिया। जिगर के टुकड़े को बेचते वक्त इस दंपति का जरा भी कलेजा नहीं कांपा। समाजिक नैतिकता को झकझोर देने वाली इस घटना ने बता दिया है कि आधी आबादी के प्रति हमारी सोच अभी भी मध्ययुगीन ही है। यह घटना इसलिए भी चिंता पैदा करती है कि डेढ़ साल की दुधमुंही बेटी को बेचने में पिता के साथ-साथ उसकी मां की भी सहमति थी, जो कि खुद एक औरत है। आखिर कोई औरत अपनी ही जाति के प्रति इतनी निर्दयी कैसे हो सकती है। बेटी को बेचने वाले चीनी दंपति फुजियान प्रांत के ए. दुआन व जिओ मी हैं। दोनों को सोशल साइट क्यूक्यू पर अपनी बेटी का खरीदार मिला। चीन की सरकारी पीपुल्स डेली ऑनलाइन की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि इस बच्ची का जन्म अवांछित रूप से गर्भवती होने के बाद हुआ था। इसका मतलब है कि दंपति को अपनी इस अनवांटेड बेटी को बेचने में जरा भी दर्द महसूस नहीं हुआ। बॉलीवुड अभिनेत्री कंगना रनावत ने भी खुद के बारे में खुलासा किया है कि जब वह पैदा हुई थीं, तब उनके पैरेंट्स नाखुश थे। जबकि उनकी बड़ी बहन के जन्म पर घरवाले बेहद खुश थे। लेकिन दूसरे बच्चे के तौर पर मैं हुई तो परिवार वाले दुखी हो गए। उस दौरान मुझे अनवॉन्टेड चाइल्ड माना जाता था। इससे पहले बैडमिंटन स्टार साइना नेहवाल ने भी कहा था कि जब वह पैदा हुई तो उनकी दादी ने उनका चेहरा तक नहीं देखा था। भारत में इस तरह की अनगिनत कहानी है जिसमें बेटी पैदा होने पर उसे अनवांटेड संतान मान कर उसकी उपेक्षा की गई। कई समाज में बेटियों को कोख में ही मार दिया जाता है। चीनी पिता के बेटी बेचने जैसी घटना भारत में भी देखने को मिलती है। झारखंड, बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा, मध्यप्रदेश में गरीबी के चलते कई मां-बाप अपनी बेटी बेच देते हैं। नेपाल से भी बेटी बेचने की खबर आती रहती है। बेटियों को बेचने का यह कुकृत्य ह्यमन ट्रैफिकिंग के तहत बाकायदा सिंडिकेट की तरह चलता है। इस पूरे प्रकरण में स्त्री के प्रति समाज की संकीर्ण सोच परिलक्षित होती है। भारत, चीन ही नहीं नेपाल, भूटान, खाड़ी देश समेत करीब-करीब पूरी दुनिया में महिलाओं के प्रति समाज का व्यवहार अभी भी दोयम है। एक दिन पहले ही विश्व ने अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया है, संयुक्त राष्ट्र से लेकर लगभग सभी देशों ने महिला उत्थान व सुरक्षा को लेकर बड़ी-बड़ी बातें कही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महिलाओं की योग्यता व क्षमता को सलाम किया है। भारत की संसद में भी महिला जनप्रतिनिधियों ने नारी सशक्तिकरण को लेकर कई बातें कही हैं, फिर भी समूची दुनिया के समाज में स्त्रियों को वो आत्मसम्मान, स्वाभिमान और स्वतंत्रता हासिल नहीं है, जिनकी वह हकदार है। इसका मतलब है कि औरतों के प्रति हमारी दृष्टि व सोच अभी भी बर्बर मध्ययुगीन जैसी बनी हुई है। बेटियों को बेचना, उसका कोख में कत्ल करना, उसे अनवांटेड संतान मानना, उसे दोयम दज्रे का नागरिक मानना, उसकी उपेक्षा करना, उसे सामाजिक बेड़ियों में जकड़ कर रखना मध्ययुगीन सोच हैं। जबकि महिलाओं को जहां भी मौका मिल रहा है, वे अपनी क्षमता साबित कर रही हैं। इसलिए जरूरी है कि 21वीं सदी में हम मध्यकाल की तरह नहीं सोचें, बेटियों के स्वतंत्र अस्तित्व को स्वीकार करें, उन्हें बोझ नहीं मानें, अपना सहारा मानें। उन्हें बेड़ियों में नहीं जकड़ें, अपने सपने पूरे करने दें। चीन जैसी घटना अपने आसपास नहीं होने दें। परिवार में बेटियों को उचित सम्मान व मौका देने की सोच विकसित करने की जरूरत है।
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