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तकनीक को न बनने दें बेटियों का दुश्मन, लिंगानुपात में गिरावट चिंता का विषय

बेटे सहारा बनते तो देश में वृद्धा आश्रमों में बढ़ोतरी नहीं होती।

तकनीक को न बनने दें बेटियों का दुश्मन, लिंगानुपात में गिरावट चिंता का विषय
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देश में लिंगानुपात में गिरावट बहुत बड़ी चिंता का विषय बना हुआ है। इसमें संतुलन लाने के लिए हाल ही में केंद्र सरकार ने बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ योजना शुरू की है। वहीं बुधवार को सुप्रीम कोर्टने भी गूगल, याहू और माइक्रोसॉफ्ट आदि सर्च इंजन की सेवा देने वाली वेबसाइट्स को आदेश देते हुए कहा है कि वे देश में लिंग परीक्षण से संबंधित विज्ञापनों को ब्लॉक करें। देश का कानून उनको इसकी इजाजत नहीं देता है। अदालत को इस पर रोक लगाने की जरूरत इसलिए पड़ी है, क्योंकि ज्यादातर लोग इंटरनेट के जरिए लिंग परीक्षण करने वाले क्लिनिक तक पहुंच रहे हैं। इन वेबसाइट्स पर सर्च करने के लिए प्रसव पूर्व लिंग परीक्षण, प्रसव पूर्व डायग्नोस्टिक, प्री-नैटल अल्ट्रासोनिक, सेक्स सेलेक्शन प्रोसीजर, सेक्स सेलेक्शन आदि की-वर्ड प्रयोग किए जाते हैं।

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लिंगपरीक्षण करने वाले क्लिनिक इस तरह के विज्ञापन वेबसाइट्स पर डाल देते हैं और जब कोई व्यक्ति इस तरह के विज्ञापनों के बारे में सर्च करता है तो गूगल, याहू, माइक्रोसॉफ्ट जैसे सर्च इंजन इस की-वर्ड को पकड़कर लिंग परीक्षण से जुड़े विज्ञापन उसके समक्ष पहुंचा देते हैं। इससे लोग घर बैठे आसानी से लिंग परीक्षण में लिप्त क्लिनिक का पता लगा लेते हैं और लिंग परीक्षण कराने पहुंच जाते हैं। जबकि लिंग परीक्षण कराना देश में एक दंडनीय अपराध है। केंद्र सरकार के लिए इस तरह के वेबसाइट्स को ब्लॉक करना आसान इसलिए नहीं होता, क्योंकि उसे संबंधित वेबसाइट के यूआरएल और आईपी एड्रेस की जानकारी नहीं होती, परंतु सर्च इंजन इस तरह के की-वर्ड को ब्लॉक करें तो लिंग परीक्षण से जुड़े विज्ञापन भी ब्लॉक हो जाएंगे। यदि ऐसा होता है तो लिंग परीक्षण पर एक हद तक अंकुश लगाया जा सकेगा और बेटियों की जान बचाई जा सकेगी। यह हमारी असंवेदनशीलता नहीं तो और क्या है कि बेटियों को जन्म से पूर्व ही मां की कोख में मार दिया जा रहा है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में छह वर्ष तक के प्रति एक हजार लड़कों की तुलना में 914 लड़कियां ही हैं। आज पूरा देश बेटियों के मामले में निर्दयी बना हुआ है!

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आज हम 21वीं सदी में जी रहे हैं, परंतु अपनी गलतफहमियों के कारण हम प्रकृति के संतुलन के नियम को बदलने का काम कर रहे हैं। आज ऐसा कोई क्षेत्र नहीं है जहां लड़कियों ने कामयाबी के झंडे न गाड़े हों। कई क्षेत्रों में तो वे लड़कों से भी आगे हैं। फिर लड़कियों को पैदा करने और उनकी लड़कों के बराबर परवरिश देने में भेदभाव क्यों होता है? दरअसल, इसकी वजह पारंपरिक सोच है कि बेटा वंश चलाएगा, बुढ़ापे का सहारा बनेगा, जबकि बेटी को तो दूसरे के घर जाना है।

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आज जो लोग भी ऐसा सोच रहे हैं, वे भारी भ्रम में हैं। यदि बेटे सहारा बनते तो देश में वृद्धा आश्रमों में बढ़ोतरी नहीं होती। इसीलिए हमें अपनी सोच बदलने की जरूरत है। हमें बेटों की तरह बेटियों को भी अमूल्य धन के रूप में समझने की शुरुआत कर देनी चाहिए। स्त्री-पुरुष एक परिवार, समाज व देश के विकास के लिए जरूरी दो पहियों के समान हैं। एक पहिया मजबूत होगा और दूसरा कमजोर तो इनकी गाड़ी नहीं चलेगी। लिहाजा, आज ही लड़कियों को सुरक्षित जन्म, समुचित शिक्षा, सामाजिक सुरक्षा और समाज में बराबरी का दर्जा देने का संकल्प लें, क्योंकि संसार चक्र चलाने और समाज को कई सारी बुराइयों से निजात दिलाने के लिए लिंगानुपात में संतुलन जरूरी है।

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