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चिंतन: आर्थिक असमानता की बढ़ती खाई चिंताजनक

अल्ट्रा हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल्स की संख्या पिछले एक साल में तीन गुनी से भी अधिक बढ़ गई है।

चिंतन: आर्थिक असमानता की बढ़ती खाई चिंताजनक

वि कास के मौजूदा तौर-तरीके दुनियाभर में लोगों के बीच आर्थिक गैर बराबरी को जन्म दे रहे हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं है। बॉस्टन कंसल्टिंग ग्रुप (बीसीजी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार देश में सुपर अमीर यानी अल्ट्रा हाई नेटवर्थ इंडिविजुअल्स (ऐसे लोग जिनकी वित्तीय संपदा 640 करोड़ रुपये से ज्यादा हो) की संख्या पिछले एक साल में तीन गुनी से भी अधिक बढ़ गई है। ऐसे सुपर अमीरों की संख्या जहां 2013 में 284 दर्ज की गई थी, वहीं 2014 में यह 928 हो गई। अभी देश की 20 फीसदी संपदा पर इनका कब्जा है। यह बढ़ती आर्थिक असमानता सिर्फ एक भारत की ही सच्चाईनहीं है। पूरी दुनिया में आर्थिक गैर बराबरी विकराल रूप धारण करती जा रही है। साल के आरंभ में ब्रिटिश चैरिटी संस्था ऑक्सफैम के अध्ययन से खुलासा हुआ था कि इस वर्षका अंत होते होते दुनिया की मात्र एक फीसदी आबादी की दौलत बाकी 99 फीसदी लोगों की कुल संपत्ति से ज्यादा हो जाएगी। यह हाल तब है जब दुनिया की सारी सरकारें और तमाम अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं गरीबी और असमानता दूर करने में दिन-रात जुटी हुई हैं। इसके बावजूद यदि हालात बिगड़ रहे हैं तो इससे साबित होता हैकि कहीं न कहीं प्रयासों में कमी है। दरअसल, दुनिया जिन आर्थिक नीतियों का अनुसरण कर रही है, उनका पारंपरिक अमीरों और नए पूंजीपति वर्ग ने जमकर फायदा उठाया है। नेताओं, नौकरशाहों और बिजनेसमैन के गठजोड़ से क्रोनी कैपिटलिज्म का नया दौर शुरू हुआ है। सार्वजनिक संसाधनों का कुछ लोगों द्वारा अपने हित में जमकर दुरुपयोग किया गया। हालांकि इन आर्थिक नीतियों के कारण विश्व अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में तेजी आई है। इस तेज वृद्धि दर के साथ बड़े पैमाने पर संपदा व समृद्धि पैदा हुई है, लेकिन यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि यह समृद्धि कुछ ही हाथों में सिमटकर रह गई है। इसका समान और न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं हुआ है। इसका नतीजा यह हुआ है कि इस दौर में जहां अमीरों और उच्च मध्यवर्ग की संपत्ति में तेजी से इजाफा हुआ है, वहीं गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों की स्थिति और खराब हुई है। तीव्र असमानता के लिए जनता द्वारा चुनी हुई सरकारें भी काफी हद तक जिम्मेदारी रही हैं। वे संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण पर ध्यान देने की बजाय वोट की राजनीति करती रहीं हैं! भले ही गरीबों को लेकर लंबी-चौड़ी बातें होती हों, लेकिन आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए कोई तार्किक पहल नहीं की गई है? अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ रही आर्थिक असमानता से विश्व समाज में कई विकृतियां भी पैदा हुई हैं। आर्थिक विषमता की चौड़ी होती खाई विश्व शांति और सभ्यता के लिए खतरनाक है। गैर बराबरी विकास एवं सामाजिक शांति के लिए उचित नहीं है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक शोध से भी यह पता चला हैकि संपदा का अमीर वगरें के हाथ में इकट्ठा होना सामाजिक हित में नहीं है। यदि इस खाई को पाटने की कोशिश नहीं की गई तो गरीबी के खिलाफ जारी लड़ाई कई दशक पीछे पहुंच जाएगी। हालांकि देश में इस दिशा में कुछ उम्मीद जगी है। दरअसल, सत्ता में आने के कुछ ही दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के सभागार में कहा था कि उनकी सरकार देश के गरीबों और वंचितों के लिए काम करेगी। एक साल के कार्यकाल के दौरान सरकार ने उस ओर कदम भी बढ़ाए हैं।

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