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किसान की आत्महत्या पर सियासत न करें

किसान निराश व हताश होकर आत्महत्या करने को विवश हैं। देश भर से किसानों की मौत की खबरें आ रही हैं।

किसान की आत्महत्या पर सियासत न करें
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देशभर में धरने और प्रदर्शनों के लिए प्रसिद्ध दिल्ली के जंतर-मंतर पर आम आदमी पार्टी यानी आप की रैली बुधवार को काला अध्याय लिख गई। रैली में सैकड़ों लोग मौजूद थे। यहां तक की दिल्ली के मुख्यमंत्री सहित उनके कैबिनेट के तमाम सहयोगी व नेता तक देखते रहे। जहां इतने जिम्मेदार लोग हों वहां एक किसान की आत्महत्या की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। तमाम लोगों के सामने आत्महत्या की घटना जितनी विचलित करने वाली है उतनी ही शर्मसार करने वाली भी।
राजस्थान से दिल्ली आए गजेंद्र सिंह के आत्महत्या करने के पीछे कौन सी वजहें थीं इसका पता तो जांच के बाद ही चल पाएगा। यह घटना हमारे समाज, प्रशासन, राजनीति और मीडिया सभी के सामने कई सवाल खड़ा करती है। उनके परिवारजनों का मानना है कि घर की आर्थिक हालत इतनी भी खराब नहीं थी, जिससे कि जान देने की नौबत आ जाए। वह कई राजनीतिक दलों के सक्रिय कार्यकर्ता भी रह चुके थे। उन्होंने चुनाव भी लड़ा था। हालांकि कईलोग आशंका जता रहे हैं कि कहीं लोगों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश में तो उस किसान की जान नहीं चली गई? लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब वह जान देने की धमकी दे रहे थे और फांसी लगाने का प्रयास कर रहे थे तो रैली स्थल पर मौजूद सैकड़ों लोग उन्हें रोकने के लिए आगे क्यों नहीं आए?
बड़ा सवाल तो आप पर भी खड़ा होता है कि किसान की आत्महत्या के बाद भी पार्टी के नेता भाषण क्यों देते रहे? इस तरह से क्या उन्होंने देश की जनता के सामने असंवेदनशीलता का नमूना पेश नहीं किया है। पार्टी आम आदमी के हितों की बात करती है, लेकिन पूरे घटनाक्रम के दौरान और बाद में उसके नेताओं द्वारा बेतुके बयान दिए जा रहे हैं, वह अशोभनीय है। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में कहा है कि जब भी ऐसे हालात पैदा होते हैं तो शांतिपूर्वक व्यक्ति को काबू में किया जाता है, लेकिन जंतर-मंतर पर नजारा कुछ अलग था। लोग नारे लगा रहे थे। तालियां बजा रहे थे। संभव है कि इससे उत्तेजना बढ़ी हो।
आप की रैली भूमि अधिग्रहण बिल के खिलाफ थी। वह किसानों की आत्महत्या को इससे जोड़ रही है, जो भ्रामक है। कानून तो अभी बना भी नहीं है। ऐसे में वह दुष्प्रचार क्यों कर रही है। हालांकि इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता है कि देश का किसान आज असहाय और बदहाल है। हाल ही में आई बेमौसम बारिश ने किसानों की कमर तोड़ दी है। किसान निराश व हताश होकर आत्महत्या करने को विवश हैं। देश भर से किसानों की मौत की खबरें आ रही हैं।
यह स्थिति कोई दस महीने में पैदा नहीं हुईहै, लेकिन जिस तरह से किसानों के गंभीर मुद्दे पर सियासत हो रही है, आरोप-प्रत्यारोप का दौर चल रहा है, उससे मूल मुद्दा नेपथ्य में चला गया है। किसान की आत्महत्या पर राजनीति नहीं होनी चाहिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ठीक कहा है कि यह समस्या बहुत पुरानी है और गहरी भी। लिहाजा किसानों को संकट से उबारने के लिए राजनीति से ऊपर उठकर सभी दलों को एकजुट होकर मंथन करना होगा। आज जरूरत किसानों को यह भरोसा दिलाने की है कि उसे हर संभव मदद मुहैया कराईजाएगी पर दुर्भाग्य है कि तमाम दल ऐसा करने व समस्या का हाल खोजने की बजाय एक दूसरे पर दोष मढ़ रहे हैं।
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