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क्या अब भी हार से सबक लेगी कांग्रेस

देखा जाए तो कांग्रेस के लिए यह बहुत बड़े संकट का समय है।

क्या अब भी हार से सबक लेगी कांग्रेस
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जम्मू-कश्मीर और झारखंड के विधानसभा चुनावों में सबसे ज्यादा किसी पार्टी की दुगर्ति हुई है तो वह बेशक कांग्रेस ही है। कांग्रेस इन दोनों राज्यों में चौथे स्थान पर खिसक गई है। ऐसा तब है जब वह दोनों जगह सत्ता में साझीदार थी। साफ है, कांग्रेस की हार का सिलसिला थमता नजर नहीं आ रहा है। पहले लोकसभा, उसके बाद हरियाणा व महाराष्ट्र और अब झारखंड व जम्मू-कश्मीर में वह हाशिए पर पहुंच गई है। ऐसे में चुनावों में हार के कारणों पर मंथन के लिए उपाध्यक्ष राहुल गांधी द्वारा पार्टी महासचिवों की बैठक बुलाना स्वाभाविक है। राहुल गांधी ने हार की वजहों को जानने के लिए बैठक में शामिल पार्टी महासचिवों से दो महीने के लिए दिल्ली से बाहर जाने को कहा है।

उन्होंने कहा कि महासचिव प्रदेश, जिला, ब्लॉक स्तर के कार्यकर्ताओं से मुलाकात करें, उनसे बात करें, उनसे सुझाव लें कि पार्टी में कहां समस्या रह गई है। अर्थात वे कौन-कौन से कारण हैं जिससे पार्टी लगातार हार रही है और जनता का भरोसा खोती जा रही है। सारे महासचिव दो महीने के अंदर इस पर एक विस्तृत रिपोर्ट देंगे। माना जा रहा हैकि इस रिपोर्ट के आधार पर राहुल गांधी पार्टी के अंदर बड़ा फेरबदल करेंगे। यहां सवाल पैदा होता है कि क्या कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को अब तक इस बात की जानकारी नहीं है कि पार्टी एक के बाद एक लगातार चुनाव क्यों हार रही है? यदि हैतो उन समस्याओं के निवारण के लिए क्या राहुल गांधी ने स्वयं कोईपहल की है? और सबसे बड़ा सवाल यह हैकि खुद राहुल गांधी लोगों से मिलने में कितनी दिलचस्पी लेते हैं? हमेशा ऐसी खबरें आती हैं कि खुद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता तक राहुल गांधी से नहीं मिल पाते हैं। यहां यह भी प्रश्न पैदा होता हैकि पार्टी उपाध्यक्ष को आम कार्यकर्ताओं की सुध अब क्यों आई है?

देखा जाए तो कांग्रेस के लिए यह बहुत बड़े संकट का समय है। देश की आजादी के बाद ऐसा कभी नहीं हुआ कि वह लोकसभा में 44 सीटों पर सिमट गई हो, बीते कुछ सालों में हुए 12 राज्यों के चुनावों में उसका खाता नहीं खुला हो और एक के बाद एक लगातार राज्यों से सत्ता गवां रही हो। दरअसल, केवल सत्ता ही नहीं, राज्यों के चुनावों में वह तीसरे-चौथे नंबर पर खिसक रही है। मौजूदा दौर में कांग्रेस की सिर्फ नौ राज्यों में सरकारें हैं। जिसमें पांच पूर्वोत्तर के राज्यों, दो उत्तर के उत्तराखंड व हिमाचल प्रदेश और दो दक्षिण के केरल व कर्नाटक में हैं। और कर्नाटक को छोड़कर कोई भी दूसरा बड़ा राज्य उसके हाथ में नहीं है। ये छोटे राज्य राजनीतिक रूप से उतने महत्वपूर्ण नहीं हैं।

ऐसे में एक परिवार विशेष से आस लगाने वाले कांग्रेसियों के लिए ये सोचने का समय है कि वे कोल्हू के बैल की तरह वैसे ही चलते रहेंगे या नए नेतृत्व, नए तौर-तरीके और नई कार्यशैली के साथ आगे बढ़ने के बारे में भी सोचेंगे। देश में पिछले एक दशक की राजनीति ने बहुत सी चीजों को बदल दिया है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो वंशवाद और व्यक्ति केंद्रित पार्टियों को देश की जनता ने सिरे से नकार दिया है। यह कांग्रेस के लिए गंभीर चिंतन-मनन और कठोर फैसले लेने का वक्त है। क्योंकि आने वाले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे महत्वपूर्णराज्यों में चुनाव होने हैं।

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