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शीत सत्र में सार्थक कामकाज की उम्मीद

इस साल मई में नरेंद्र मोदी की सरकार के सत्ता में आने के बाद संसद का यह दूसरा प्रमुख सत्र है।

शीत सत्र में सार्थक कामकाज की उम्मीद
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सोमवार से संसद का शीत सत्र आरंभ हो रहा है। करीब महीने भर चलने वाले इस सत्र में 22 बैठकें होंगी। इस साल मई में नरेंद्र मोदी की सरकार के सत्ता में आने के बाद संसद का यह दूसरा प्रमुख सत्र है। इससे पहले बजट सत्र काफी सफल रहा था। इस दौरान दस साल के यूपीए के शासनकाल के बाद संसद के औसतन एक सत्र में सबसे ज्यादा विधायी कार्य हुए थे। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह शीतकालीन सत्र भी सार्थक कामकाज का गवाह बनेगा। हालांकि जिस तरह कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, वामपंथी दल और जनता परिवार के नाम पर एकजुट हुए दल कुछ मुद्दों को लेकर उतावले दिख रहे हैं वह भी ठीक नहीं है। विरोध के नाम पर रुकावट डालने की राजनीति नहीं होनी चाहिए। कांग्रेस कई विधेयकों, जिन पर पहले सरकार का साथ देने को तैयार थी, अब उनके पारित होने पर अड़ंगा लगाने की तैयारी कर रही है।

ममता बनर्जी शारदा घोटाले और वर्धमान विस्फोट में हुई गिरफ्तारियों का बेजा राजनीतिकरण करती दिख रही हैं। देखा जाए तो संसद में अभी कुल लंबित विधेयकों की संख्या 67 है। जिसमें राज्यसभा में 59 और लोकसभा में आठ विधेयक लंबित हैं। वहीं इस सत्र में भी कई नए विधेयक पेश होने की संभावना है। सरकार भूमि अधिग्रहण संशोधन, श्रम कानून संशोधन, बीमा, लोकपाल कानून संशोधनऔर वस्तु एवं सेवा कर जैसे प्रमुख विधेयकों को पारित कराना चाहती है। ये विधेयक पास हो जाते हैं कि तो कई क्षेत्रों में सुधार देखने को मिलेगा जिससे अर्थव्यवस्था को रफ्तार मिलेगी, लेकिन विपक्षी दलों का रुख देखकर लगता है कि सरकार के सामने इन विधेयकों को पारित कराने की चुनौती होगी। आज देखा जाए तो देश यूपीए के दौर से बेहतर स्थिति में है। देश में निराशा का माहौल खत्म हुआ है। अर्थव्यवस्था पटरी पर लौट रही है। महंगाई की मार भी कम हुई है। विदेश नीति के मोर्चे पर सरकार को काफी सफलता मिली है। इस बीच मोदी सरकार ने मेक इन इंडिया, जनधन योजना, श्रमेव जयते आदि योजनाएं शुरू की है। इनमें भी तेजी लाने के लिए इन अहम विधेयकों का पास होना जरूरी है। विपक्ष को चाहिए कि आर्थिक सुधार जैसे मुद्दे पर अड़चन पैदा करने की बजाय बहस के जरिये आपसी मतभेदों को दूर करे।

हालांकि रविवार को सत्तारूढ़ दल भाजपा और उससे एक दिन पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने सर्वदलीय बैठक कर सभी दलों से संसद चलाने में सहयोग का आह्वान किया है। वहीं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अपनी मंशा पहले ही साफ कर दी है कि वह सभी छोटे-बड़े दलों को साथ लेकर चलेंगे, लेकिन विपक्षी दल कुछ ज्यादा ही सख्त रवैया दिखा रहे हैं। संसद का बार-बार बाधित होना एक बड़ी समस्या रही है। 15वीं लोकसभा का उदाहरण हमारे सामने है। भाजपा साफ कर चुकी है कि वह संसद को हंगामेदार बनाने की बजाय सार्थक बहस का मंच बनाना चाहती है। लिहाजा विपक्षी दल भी शोरगुल करने की बजाय बहस को प्राथमिकता दें तो बेहतर होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि बजट सत्र की भांति इस बार भी संसद का महत्वपूर्ण वक्त बर्बाद नहीं होगा। वैसे भी संसद विचार-विमर्श व चर्चा का मंच है, राजनीति करने का माध्यम नहीं।

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