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मतदाताओं को भ्रम में डालने की रणनीति

देश में जैसे-जैसे चुनावी सरगर्मियां तेज हो रही हैं वैसे ही दल अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश में लग गए हैं।

मतदाताओं को भ्रम में डालने की रणनीति
नई दिल्ली. देश में जैसे-जैसे चुनावी सरगर्मियां तेज हो रही हैं वैसे-वैसे दल अपने-अपने पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश में लग गए हैं। कहीं नए सिरे से दलों में लोकतांत्रिक तरीके से गठबंधन हो रहे हैं तो कहीं दलबदल की ओछी राजनीति भी हो रही है। इसी बीच बिहार की राजनीति में सोमवार को एक बड़ा ड्रामा देखने को मिला जब राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के 13 विधयक पार्टी से नाता तोड़ अलग गुट होने का दावा करने लगे। उन्होंने राजद का साथ छोड़कर जदयू में जाने की घोषणा भी कर दी। इतना ही नहीं उनके घोषणा करने के बाद आनन-फानन में विधानसभा स्पीकर ने सशरीर बुलाकर उनसे पूछे बिना ही नए गुट के तौर पर उन्हें मान्यता भी दे डाली और तुरंत विधानसभा सचिव ने इस बाबत अधिसूचना भी जारी कर दी। लेकिन उसके बाद जो हुआ वह भी देश के मौजूदा राजनीतिक हालात में स्वाभाविक ही था।
बागी आठ विधायक खुद के साथ धोखा होने के अवसरवादी तकरें का सहारा ले राजद में लौट आए। उन्होंने कहा कि वह पहले भी राजद का ही हिस्सा थे और अब भी राजद का हिस्सा हैं। वहीं मंगलवार को राजद ने दावा किया कि 13 बागी विधायकों में से नौ वापस लौट आए हैं। लोकसभा चुनावों से पूर्व इस घटनाक्रम ने कई सवाल खड़े किए हैं। गत वर्ष नीतीश कुमार की जदयू एनडीए से अलग हो गई थी। उसके साथ ही राज्य में भाजपा और जदयू की गठबंधन सरकार का भी अंत हो गया था और नीतीश कुमार की सरकार अल्पमत में आ गई थी।
हालांकि कांग्रेस और निर्दलीय विधायकों सहित दूसरे दलों के सर्मथन से नीतीश ने सदन में विश्वास मत हासिल कर लिया, परंतु जैसे-जैसे देश लोकसभा चुनावों की ओर बढ़ने लगा सत्ताधारी पार्टी कांग्रेस के प्रति एक ऊब साफ देखी जाने लगी है। इस बीच भाजपा से अलग होने के बाद नीतीश के जनाधार में भी कुछ कमी आई है। वहीं भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी के पक्ष में देश में एक लहर चल रही है। गत दिनों जितने भी सर्वे हुए सबमें यही कहा गया कि प्रधानमंत्री के रूप में मोदी लोगों की पहली प्राथमिकता हैं। आम आदमी पार्टी के संयोजक और पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक अखबार को दिए इंटरव्यू में कहा है कि देश में नरेंद्र मोदी की लहर है।
हाल ही में आए एक सर्वे में कहा गया हैकि बिहार में भाजपा सबसे ज्यादा सीटें जीत सकती है, वहीं नीतीश कुमार को कम सीटों से संतोष करना पड़ सकता है। इसे लेकर नीतीश कुमार के भीतर असुरक्षा की भावना है। इसी वजह से नीतीश कुमार की पार्टी बिहार में यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि देखो दूसरे दलों के विधायक टूट रहे हैं और जदयू की ओर आ रहे हैं। दरअसल, यह लोगों को भ्रम में डालने की रणनीति है जिससे मतदाता उनकी ओर आकर्षित हो सकें। इन दिनों नीतीश कुमार 12क्षेत्रीय दलों के साथ मिलकर एक गैर-कांग्रेस और गैर-भाजपा मोर्चा बनाने की कोशिश कर रहे हैं। हालांकि अब तक यह कथित तीसरा मोर्चा अवसरवादियों का कुनबा साबित हुआ है। आज लोग एक स्थाई सरकार चाहते हैं, जो विकास की राजनीति करती हो और सुशासन देने के साथ देश के नागरिकों के प्रति जवाबदेह हो। अब देखना है कि मतदाता अवसरवादियों के साथ कितना खड़ा होता है।
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