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श्रीलंका में सत्ता परिवर्तन भारत के लिए अहम

राजपक्षे अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थे, इसी वजह से उन्होंने तय समय से दो साल पहले ही चुनाव करवाने का फैसला किया था।

श्रीलंका में सत्ता परिवर्तन भारत के लिए अहम
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पड़ोसी देश श्रीलंका में महिंदा राजपक्षे के दस साल के शासन का अंत हो गया है। वहां राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनाव में विपक्षी उम्मीदवार मैत्रीपाल सिरीसेना की जीत हुई है। हालांकि राजपक्षे अपनी जीत को लेकर आश्वस्त थे, इसी वजह से उन्होंने तय समय से दो साल पहले ही चुनाव करवाने का फैसला किया था। राजपक्षे पहली बार 2005 और दूसरी बार 2010 में श्रीलंका के राष्ट्रपति की कुर्सी पर बैठे थे, अब वह तीसरी बार भी राष्ट्रपति बनना चाहते थे, लेकिन वहां का संविधान उन्हें दो बार से ज्यादा राष्ट्रपति बनने की इजाजत नहीं दे रहा था। इसके लिए उन्होंने श्रीलंका के संविधान में बाकायदा संशोधन भी कराया, परंतु वे अपने मकसद में कामयाब नहीं हो सके।

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इस चुनावी दौड़ में कुल 19 उम्मीदवार शामिल थे, लेकिन असली मुकाबला महिंदा राजपक्षे और सिरीसेना के बीच ही था। दरअसल, सिरीसेना श्रीलंका फ्रीडम पार्टी के महासचिव हैं और वे पूर्व राष्ट्रपति महिंदा राजपक्षे के मंत्रिमंडल में शामिल थे। इस चुनाव में वे विपक्षी दलों के उम्मीदवार के रूप में खड़े हुए थे। हालांकि इसमें कोई शक नहीं कि लिट्टे के खिलाफ सफल लड़ाईके बाद श्रीलंका में राजपक्षे की लोकप्रियता काफी बढ़ी थी, जिससे 2010 में वे आसानी से राष्ट्रपति का चुनाव जीत गए थे। इस प्रकार वे करीब एक दशक तक वहां के निर्विवादित नेता रहे हैं, लेकिन बाद के दिनों में कई चीजें उनके खिलाफ होती चली गर्इं।

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श्रीलंका आज सिंहली बहुसंख्यकों और तमिल अल्पसंख्यकों के बीच विभाजन से जूझ रहा है। वहां के मतदाताओं खासकर युवाओं के बीच विकास, महंगाई, रोजगार बड़ा मुद्दा बना हुआ है। राजपक्षे पर भाई-भतीजावाद को बढ़ावा देने, कुशासन, भ्रष्टाचार और तानाशाही के आरोप भी लगते रहे। राजपक्षे के तीनों भाई रक्षा मंत्री, संसद के अध्यक्ष और वित्तमंत्री थे। इसके अलावा भी उनके परिवार के कई सदस्य महत्वपूर्ण पदों पर बैठे थे। वहीं तेरह फीसदी आबादी वाले तमिलों में राजपक्षे के सैन्य अभियान को लेकर गुस्सा था और उन्होंने सिरीसेना के पक्ष में मतदान किया। सिरीसेना मुस्लिम बहुल इलाकों में भी मजबूत बढ़त बनाने में सफल रहे। इन सबके अलावा वे ताकतवर सिंहली समुदाय के चर्चित नेताओं में से एक रहे हैं। ये सभी राजपक्षे के खिलाफ गया है।

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पूर्व विदेश सचिव शशांक ने कहा है कि सिरीसेना की जीत न केवल भारत बल्कि पश्चिमी देशों के लिए अच्छी खबर है। पश्चिमी देश जहां श्रीलंका में हुए मानवाधिकारों के घोर उल्लंघन से नाराज हैं तो भारत तमिल हितों की रक्षा न होने से चिंतित है। राजपक्षे ने तमिलों के नरसंहार और उनके पुनर्वास मामले में भारत की चिंता को तरजीह नहीं दी। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के साथ-साथ पश्चिमी देशों के सुझावों की भी अनदेखी की। चुनाव पूर्व तो यहां तक कहा जा रहा था कि चीन व पाकिस्तान को छोड़कर कोई देश राजपक्षे को तीसरी बार जीतते देखना नहीं चाहता। उनके कार्यकाल में श्रीलंका की चीन व पाकिस्तान से दोस्ती बढ़ी है, जो कि भारत के लिए चिंता की बात है। माना जा रहा है कि भारत विरोधी खासतौर पर तमिल विरोधी छवि नहीं होने के कारण सिरीसेना बातचीत के माध्यम से भारत के साथ सभी विवादित मुद्दों को सुलझाने पर ध्यान देंगे।

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