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सवालों के घेरे में चुनाव आयोग की निष्पक्षता

पूरी मशीनरी आयोग के हाथों में होने के बावजूद उसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करते हैं।

सवालों के घेरे में चुनाव आयोग की निष्पक्षता
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भारतीय लोकतंत्र के आकार को देखते हुए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि चुनाव आयोग इस समय बड़ी भूमिका का निर्वाहन कर रहा है। मतदाताओं की संख्या के आधार पर भारत दुनिया का विशालतम लोकतंत्र है। जिस आयोजन में करोड़ों लोगों की प्रत्यक्ष भागीदारी हो उसे सफलतापूर्वक संपन्न कराना अपने आप में ही चुनौती है। अब तक सात चरणों के चुनाव संपन्न हो चुके हैं। उस पर संतोष जताया जा रहा है, लेकिन इस बीच कुछ समस्याएं भी सामने आयी हैं, जिनकी अनदेखी नहीं की जा सकती। इससे चुनाव आयोग की भूमिका ही सवालों के घेरे में है। और आयोग जिस तरह से इस पर खामोश है उससे भी सवाल खड़ा होता है। रविवार को पश्चिम बंगाल में अपनी रैली में भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने चुनाव आयोग पर आरोप लगाते हुए कहा था कि वह हिंसा और चुनावों में धांधली रोकने में नाकाम रहा है। आज जब यह कहा जाने लगा था कि देश में चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से संपन्न हो रहे हैं और धांधली बीते दिनों की बात हो गई है तब बिहार, उत्तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल में ऐसी शिकायत ठीक नहीं है। चुनाव आयोग को जवाब देना चाहिए। क्योंकि पूरी मशीनरी आयोग के हाथों में होने के बावजूद ऐसी शिकायतें उसकी निष्पक्षता पर सवाल खड़ा करते हैं। अब शेष बचे दो चरणों के मतदान में अतिरिक्त सतर्कता बरतनी चाहिए, जिससे चुनाव निष्पक्ष तरीके से संपन्न हो सकें। कहां तो आयोग इसे गंभीरता से लेता पर उसके फैसलों को देखते हुए उस पर आरोप लग रहे हैं कि वह नरेंद्र मोदी पर एकतरफा कार्रवाई कर रहा है। सोमवार को अयोध्या से महज कुछ ही दूरी पर फैजाबाद में मोदी की रैली थी। मंच के बैकग्राउंड पर राम की बड़ी तस्वीर लगी थी। इसे चुनाव आयोग आचार संहिता के उल्लंघन से जोड़ रहा है। आयोग के अनुसार ऐसे प्रतीकों और चिह्नें को नहीं लगा सकते। आश्चर्य हैकि वह उन चीजों पर उनको घेर रहा है जिनको नोटिस में नहीं लिया जाना चाहिए। इसे सांप्रदायिक नजरिए से देखने की कोई जरूरत नहीं है। राम देश में आस्था का केंद्र हैं और आम संबोधनों में लोग उनका नाम लेते हैं। चुनाव आयोग विरोधी दलों की शिकायतों के आधार पर इसमें नाहक ही दिलचस्पी ले रहा है। अभी कुछ ही दिनों पूर्व नरेंद्र मोदी ने वडोदरा में मतदान करने के बाद कमल का चिह्न् दिखाया था। उसे चुनाव आयोग ने आचार संहिता के उल्लंघन का बड़ा मुद्दा मान उनके खिलाफ एफआईआर तक दर्ज करा दिया। मोदी ने इसके खिलाफ नाराजगी जाहिर करते हुए कहा भी था कि उन्होंने कोई चाकू नहीं दिखाया था। जिस तरह से मोदी के प्रति विरोधी दल के नेता बदजुबान का इस्तेमाल कर रहे हैं उन पर कोई कार्रवाई नहीं हो रही है। चुनाव आयोग ने स्वयं ही कहा हैकि सभी उम्मीदवार एक दूसरे के खिलाफ र्मयादित भाषा का प्रयोग करें, परंतु मोदी के खिलाफ अर्मयादित भाषा की बाढ़ आई हुई है उस पर आयोग क्यों चुप है? चुनाव आयोग को यह तय करना होगा कि क्या वह हल्ला मचाने वालों या दूसरों की शिकायतों के आधार पर कार्रवाई करेगा या उसका अपना कोई अपना आधार भी होगा।

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