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अनिश्चितता के भंवर से निकली दिल्ली

अरविंद की कार्यप्रणाली को लेकर पार्टी के भीतर ही कई बार असंतोष खुलकर सामने आते रहे हैं

अनिश्चितता के भंवर से निकली दिल्ली

करीब नौ माह की राजनीतिक अनिश्चितता के बाद दिल्ली में अब विधानसभा चुनाव का रास्ता साफ हो गया है। क्योंकि दिल्ली विधानसभा को भंग करने की उपराज्यपाल नजीब जंग की सिफारिश को केंद्रीय कैबिनेट ने मंजूर कर लिया है। कैबिनेट के फैसले को राष्ट्रपति की मंजूरी की औपचारिकता पूरी होने के बाद विधानसभा भंग करने की अधिसूचना जारी कर दी जाएगी। अब दिल्ली में खाली हुए तीन सीटों के लिए होने वाले उपचुनाव भी रद्द हो जाएंगे। उपराज्यपाल ने सोमवार को तीनों पार्टियों भाजपा, आप और कांग्रेस से सरकार बनाने की संभावना पर अलग-अलग बात की थी। तीनों दलों द्वारा सरकार बनाने से इंकार करने और फिर से चुनाव कराने की मांग के बाद विधानसभा भंग कराना ही एक मात्र विकल्प रह गया था।

दिल्ली में फिलहाल राष्ट्रपति शासन लगा है, जो अगले साल 16 फरवरी को खत्म हो रहा है। इससे पूर्व वहां निर्वाचित सरकार बन जानी चाहिए। लिहाजा अब चुनाव आयोग को फैसला लेना है कि वह मौजूदा जम्मू-कश्मीर और झारखंड विधानसभा चुनावों के साथ ही दिल्ली में भी चुनाव कराना चाहेगा या फिर जनवरी के अंत में। दरअसल दिल्ली में ये हालात उस समय पैदा हुए थे जब मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जनलोकपाल के मुद्दे पर महज 49 दिन सरकार चलाने के बाद इस्तीफा दे दिया था। कई लोग उनके उस फैसले को राजनीतिक फायदा उठाने के मकसद से उठाया गया कदम करार देते हैं।

दिल्ली में गत वर्ष दिसंबर के विधानसभा चुनाव में किसी को भी स्पष्ट बहुमत नहीं मिला था। भाजपा 32 सीटें जीत सबसे बड़ी पार्टी बनी थी, उसके बाद 27 सीटों के साथ आप दूसरे और फिर आठ सीटों के साथ कांग्रेस तीसरे स्थान पर आई थी। 15 साल से सत्ता में रही कांग्रेस हाशिए पर चली गई। बाद में तेजी से घटे घटनाचक्र में कांग्रेस के बाहर से समर्थन से आप सरकार बना ली। हालांकि यह भी आश्चर्य था कि जिस कांग्रेस के भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आप चुनाव लड़ी और अप्रत्याशित सफलता प्राप्त की उसी के समर्थन से वह सत्ता में आ गई, लेकिन अल्प शासनकाल में भी अरविंद केजरीवाल कोई नया विजन नहीं दे पाए थे और सब्सिडी आधारित खैरात बांटने की नीति पर ही आगे बढ़ते दिखे। वहीं उनके कई फैसले काफी अलोकप्रिय भी हुए। उन पर संविधान की अवहेलना करने तक के आरोप लगे। इन आठ महीनों में राष्ट्रीय राजनीति में कई घटनाएं घट चुकी हैं। केंद्र में भाजपा की सरकार है। वहीं दिल्ली की सभी सातों सीटों पर भाजपा का ही कब्जा है।

इस बीच अरविंद की कार्यप्रणाली को लेकर पार्टी के भीतर ही कई बार असंतोष खुलकर सामने आते रहे हैं। शाजिया इल्मी सहित उसके कई दिग्गज पार्टी छोड़ चुके हैं। वहीं भाजपा लोकसभा और हाल ही में हरियाणा तथा महाराष्ट्र में मिली सफलता से उत्साहित है। उसके पास नरेंद्र मोदी जैसा लोकप्रिय चेहरा है। जिसे वह दिल्ली में भी भूनाना चाहेगी। शायद यही वजह है कि उसने किसी को मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित नहीं करने का फैसला किया है। निश्चित रूप से कांग्रेस के सामने अस्तित्व बचाने का संकट होगा। अब देखना है कि दिल्ली की जनता किसको सत्ता सौंपती है।

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