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गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अभी भी दूर की कौड़ी, व्यवस्था में वैश्विक प्रतियोगिता

प्रथम’ हर साल असर (एनुअल स्टेटस आॅफ एजुकेशन रिपोर्ट) नाम से रिपोर्टजारी करती है।

गुणवत्तापूर्ण शिक्षा अभी भी दूर की कौड़ी, व्यवस्था में वैश्विक प्रतियोगिता
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देश के सरकारी स्कूल (खासकर ग्रामीण क्षेत्रों के) छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने के मामले में किस कदर पीछे हैं, इसके प्रमाण गैर सरकारी संस्था ‘प्रथम’ द्वारा जारी 10वीं असर रिपोर्ट-2014 में दर्ज हैं। शिक्षा के नाम पर अरबों रुपए फूंकने के बाद भी जमीनी हालात अभी सुधार से कोसों दूर नजर आ रहे हैं। रिपोर्टमें कहा गया हैकि देश में कक्षा पांच के औसतन 48.1 फीसदी छात्र ही कक्षा दो की किताबें पढ़ने में सक्षम हैं। वहीं आठवीं कक्षा के 25 फीसदी छात्र दूसरी कक्षा का पाठ नहीं पढ़ सकते हैं। ‘

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प्रथम’ हर साल असर (एनुअल स्टेटस आॅफ एजुकेशन रिपोर्ट) नाम से रिपोर्टजारी करती है। इस बार इसने 577 जिलों के चुनिंदा गांवों के 5.70 लाख बच्चों का सर्वे कर यह रिपोर्ट बनाई है। ग्रामीण स्कूलों में वैसे छात्रों की संख्या ज्यादा है जो न तो अंकों को पहचानने में सक्षम हैं और न ही गणित के बेसिक प्रश्नों को हल करने में सक्षम हैं। आठवीं कक्षा के सिर्फ 46 फीसदी छात्र ही अंग्रेजी की साधारण किताब को पढ़ सकते हैं। सर्वेमें यह बात सामने आई है कि प्राइवेट स्कूलों में नामांकन की दर बढ़ी है। वर्ष 2013 में जहां 8.4 फीसदी बच्चे निजी स्कूलों में जा रहे थे। वहीं 2014 में इनकी संख्या बढ़ कर 12 फीसदी हो गयी है। नीति निर्माताओं को इस सर्वे के तथ्यों पर ध्यान देना चाहिए। असर की रिपोर्ट दिखाती है कि पढ़ने-लिखने का स्तर संतोषजनक नहीं है। बेशक, यह रिपोर्ट व्यवस्था से जुड़े लोगों को कठघरे में खड़ा करती है।

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वर्तमान ज्ञान आधारित विश्व में अपनी पूर्ण क्षमता का दोहन करने के लिए सबसे जरूरी है कि हम पहले अपनी प्राथमिक शिक्षा को गुणवत्तापूर्ण बनाएं। प्राथमिक शिक्षा के सुधार के प्रति गठित कई आयोगों ने अपनी सिफारिशों में भी इस बात को दोहराया है कि देश में शिक्षा व्यवस्था की स्थिति किसी भी दृष्टिकोण से गुणवत्तापूर्ण नहीं है। साथ ही हमें शिक्षा पर जीडीपी का कम से कम छह प्रतिशत तक खर्च करना चाहिए। स्कूलों की आधारभूत जरूरतों को चिह्नित कर उनकी पूर्ति करनी होगी। एक अहम सवाल यह भी है कि सरकारी शिक्षा तंत्र के प्रति लोगों का मोहभंग क्यों हो रहा है, जबकि सरकारी स्कूलों के प्रति आकषर्ण बढ़ाने के लिए अनाज वितरण योजना और मध्याह्न भोजन योजना जैसे कार्यक्रम चलाए गए हैं। सरकारी स्कूलों में घटते छात्रों की संख्या का कारण यकीनन गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व आधारभूत संरचना का अभाव ही रहा है। आज देश में प्राथमिक स्कूलों की स्थिति काफी दयनीय है।

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हालांकि यह स्थिति केवल प्राथमिक शिक्षा व्यवस्था की ही नहीं है। आज देश की संपूर्ण शिक्षा व्यवस्था विकृत हो चुकी है! इसे सुधारने के प्रयास नाकाफी हैं। बहरहाल, हम अपने बच्चो को प्रारंभिक शिक्षा किस प्रकार की देते हैं, उसके भावी भविष्य का निर्धारण भी इसी से होता है। शिक्षा का मुद्दा राज्यों के अधिकार क्षेत्र में आता है। जाहिर है, राज्य सरकारों को इसकी शुरुआत शिक्षा व्यवस्था में व्यापक और जमीनी सुधार से करनी होगी, तभी हम वैश्विक प्रतियोगिता का सामना कर पाएंगे। शिक्षा पर समुचित खर्च के साथ-साथ यदि उसकी गुणवत्ता पर ध्यान दे दिया जाए तो हम अपने उद्देश्य में सफल हो जाएंगे और भारत को विकसित करने की दिशा में बढ़ पाएंगे।

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