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तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था और इसके विरोधाभास

योजना आयोग के आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे भारत में रहते हैं।

तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था और इसके विरोधाभास
विश्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत परचेजिंग पावर पैरिटी (पीपीपी) के आधार पर दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। भारत ने जापान को पछाड़कर यह स्थान हासिल किया है। हालांकि जीडीपी गणना के पारंपरिक तरीके के अनुसार भारत की अर्थव्यवस्था अभी भी जापान से काफी पीछे है। इससे पहले 2005 के सर्वे में भारत की अर्थव्यवस्था इस मामले में 10वें पायदान पर थी। मात्र छह वर्षों में यह छलांग लोगों की बढ़ती क्रय शक्ति से हासिल हुई है। पीपीपी का इस्तेमाल अलग-अलग देशों में मौजूदा कीमतों में अंतर को व्यवस्थित कर लोगों की आय और अर्थव्यवस्था की तुलना करने में होता है। इससे दो देशों के लोगों के सामान खरीदने की शक्ति का पता चलता है। इस प्रकार यह अलग-अलग देशों में लोगों के रहन-सहन के स्तर की तुलना में भी काम आता है।
विदेशी मुद्रा भंडार और प्रति व्यक्ति आय के आधार पर तुलना करने की अपेक्षा इस तरह की तुलना कहीं बेहतर और सटीक मानी जाती है। आंकड़ों के मुताबिक, पीपीपी के लिहाज से 2011 में वैश्विक जीडीपी में भारत की हिस्सेदारी 6.4 फीसदी थी, जबकि चीन और अमेरिका की क्रमश: 14.9 और 17.1 फीसदी रही। रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि हाल के वर्षों में भारत में मुद्रास्फीति की दर ऊंची बनी हुई है, परंतु यहां महंगाई की यह दर विकसित देशों के मुकाबले कम है। यानी जिस दर पर यहां सामान मिलते हैं विदेशों में उससे कहीं महंगे दरों पर मिलते हैं। भारत को इसी वजह से यह स्थान प्राप्त हुआ है।
भारत का इस आधार पर अमेरिका और चीन के बाद दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने को भले ही एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है, परंतु इसके आंतरिक विरोधाभास भी कम नहीं हैं। यहां जिस तरह बेहिसाब गरीबी है, भुखमरी है, कुपोषण है और आर्थिक विषमता अर्थात अमीरी-गरीबी की गहरी खाईदेखने को मिल रही है वे इसकी इस उपलब्धि को फीका करने के लिए काफी हैं। यहां की सामाजिक-आर्थिक चुनौतियां दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था की एक अलग ही तस्वीर पेश कर रही हैं।
योजना आयोग के आंकड़े इस बात के गवाह हैं कि दुनिया में सबसे ज्यादा कुपोषित बच्चे भारत में रहते हैं। वहीं देश की करीब अस्सी फीसदी जनता प्रतिदिन सवा डॉलर से भी कम पर जीवन-यापन कर रही है। एक तरफ तो हम आर्थिक महाशक्ति होने का दंभ भर रहे हैं और दूसरी तरफ हर क्षेत्र में संसाधनों का अभाव साफ दिखाई देता है। ऐसा क्यों है? यदि हमारी आर्थिक शक्ति बढ़ रही है तो इसका सामान्य जन जीवन पर असर भी दिखना चाहिए। यह सही है कि देश में लोगों की आय बढ़ी है और उनकी खरीद शक्ति भी बढ़ी है, लेकिन अभी भी देश की एक बड़ी आबादी हाशिए पर है और आर्थिक विकास से वह लगभग अछूती है। दरअसल, कुछ लोगों की खरीद शक्ति के आधार पर पूरी अर्थव्यवस्था का जायजा नहीं लिया जा सकता है। इस समस्या से समय रहते पार पाना होगा तभी यह उपलब्धि कायम रह सकती है और बड़ी अर्थव्यवस्था होने का लाभ सभी लोगों को मिला सकता है।
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