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आर्थिक विषमता की बढ़ती खाई को पाटना जरूरी

दुनिया की आधी आबादी के पास जितनी संपत्ति है उतनी संपत्ति दुनियाभर के केवल 80 धनी व्यक्तियों के पास है।

आर्थिक विषमता की बढ़ती खाई को पाटना जरूरी
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विकास के मौजूदा तौर-तरीके दुनियाभर में लोगों के बीच आर्थिक गैरबराबरी को जन्म दे रहे हैं। जानीमानी संस्था आॅक्सफैम की शोध रिपोर्ट में यह बात सामने आई हैकि दुनिया भर के 99 फीसदी लोगों के पास जितनी संपत्ति है, उतनी दौलत अकेले एक फीसदी अमीरों के पास है। अर्थात विश्व की आधी संपत्ति पर इन एक फीसदी लोगों का कब्जा है। रिपोर्ट में कहा भी गया है कि असमानता की यह खाई आने वाले दिनों में और गहरी हो जाएगी। यह जानकर हैरानी होती है कि दुनिया की आधी आबादी के पास जितनी संपत्ति है उतनी संपत्ति दुनियाभर के केवल 80 धनी व्यक्तियों के पास है।

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इन तथ्यों के आधार पर कहा जा सकता है कि देश में एक ओर अरबपतियों की संख्या और उनकी दौलत में दिन दूनी, रात चौगुनी बढ़ोतरी हो रही है, वहीं दूसरी ओर गरीबों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। साठ व सत्तर के दशक के शुरुआती कुछ वर्षों तक गरीबी और अमीरी के बीच इतना गहरा फर्क नहीं दिखाई देता था, जितना आज दिखने लगा है। गैरबराबरी का यह दृश्य आज हम खुली आंखों से दुनिया में हर स्तर पर देख सकते हैं। दरअसल, दुनिया जिन आर्थिक नीतियों का अनुसरण कर रही है, उनका पारंपरिक अमीरों और नए पूंजीपति वर्ग ने जमकर फायदा उठाया है। नेताओं, नौकरशाहों और बिजनेसमैन के गठजोड़ से क्रोनी कैपिटलिज्म का नया दौर शुरू हुआ है। सार्वजनिक संसाधनों का कुछ लोगों द्वारा अपने हित में जमकर दुरुपयोग किया गया।

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इसमें कोई शक नहीं है कि इन आर्थिक नीतियों के कारण विश्व अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर में तेजी आई है। इस तेज वृद्धि दर के साथ बड़े पैमाने पर संपदा व समृद्धि पैदा हुई है, लेकिन यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि यह समृद्धि कुछ ही हाथों में सिमटकर रह गई है। इसका समान और न्यायपूर्ण बंटवारा नहीं हुआ है। इसका नतीजा यह हुआ है कि इस दौर में जहां अमीरों और उच्च मध्यवर्ग की संपत्ति में तेजी से इजाफा हुआ है, वहीं गरीबों और हाशिए पर पड़े लोगों की स्थिति और खराब हुई है। तीव्र असमानता के लिए जनता द्वारा चुनी हुई सरकारें भी काफी हद तक जिम्मेदारी रही हैं। वे संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण पर ध्यान देने की बजाय वोट की राजनीति करती रहीं हैं! भले ही गरीबों को लेकर लंबी-चौड़ी बातें होती हों, लेकिन आर्थिक असमानता को दूर करने के लिए कोई तार्किक पहल नहीं की गई है? अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ रही आर्थिक असमानता से विश्व समाज में कई विकृतियां भी पैदा हुई हैं।

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भारत में ही करीब अस्सी फीसदी आबादी रोजाना सवा डॉलर से भी कम राशि पर गुजारा करने को अभिशप्त है। आॅक्सफैम के निदेशक विनी ब्यानयिमा ने ठीक ही कहा हैकि आर्थिक विषमता की चौड़ी होती खाई विश्व शांति और सभ्यता के लिए खतरनाक है। यदि इस खाई को पाटने की कोशिश नहीं की गई तो गरीबी के खिलाफ जारी लड़ाई कईदशक पीछे पहुंच जाएगी। हालांकि देश में इस दिशा में कुछ उम्मीद जगी है। दरअसल, सत्ता में आने के कुछ ही दिन बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संसद के सभागार में कहा था कि उनकी सरकार देश के गरीबों और वंचितों के लिए काम करेगी।

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