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तीन साल बनाम चार साल की जंग में शिक्षा

अभी देश में 700 विश्वविद्यालय और 35,539 कॉलेज हैं, लेकिन दुनिया के शीर्ष दो सौ में एक भी विश्वविद्यालय नहीं है।

तीन साल बनाम चार साल की जंग में शिक्षा
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दिल्ली विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के बीच छिड़े विवाद में यदि कोई पिस रहा है तो वे हजारों छात्र हैं जो बेहतर भविष्य की उम्मीद में उच्च शिक्षा हासिल करना चाहते हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) चाहता हैकि उससे संबद्ध सभी कॉलेजों में स्नातक स्तर पर सभी पाठ्यक्रम चार साल के हों जबकि यूजीसी उन्हें तीन साल ही रखना चाहता है।
डीयू के वाइस चांसलर दिनेश सिंह ने इस्तीफा देने तक की घोषणा कर दी है तब उम्मीद की जा रही है कि मामला जल्द ही सुलझ जाएगा, क्योंकि यह उनकी ही सोच थी और उन्हीं के कड़े रुख के कारण विवाद इतना बढ़ा है। चार वर्षीय स्नातक स्तर का प्रोग्राम पिछले वर्ष से लागू है और अभी करीब 60 हजार छात्र उसमें शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं। यह पाठ्यक्रम शुरू से ही विवादों में रहा है। डीयू का कहना हैकि वह स्वायत्त संस्था है और उसके पास ऐसे पाठ्यक्रम लागू करने के अधिकार हैं जबकि यूजीसी की दलील है कि उसने इस कोर्स को मान्यता नहीं दी है, लिहाजा वह स्वायत्तता के नाम पर मनमानी नहीं कर सकता।
चार वर्षीय कोर्स को राष्ट्रपति की मंजूरी भी नहीं मिली है। ऐसे में बिना मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रम को छात्रों को पढ़ाना उनके भविष्य के साथ खिलवाड़ के बराबर होगा। दरअसल, यह सारी समस्या देश में निम्न और उच्च शिक्षा के स्तर पर कोई समग्र शिक्षा नीति का नहीं होना है। उच्च शिक्षा के लिए देश में एक तय पाठ्यक्रम नहीं है, सभी विश्वविद्यालय अपने अनुसार बनाए पाठ्यक्रमों और सिलेबस के तहत छात्रों को शिक्षा देते हैं। यही हाल राज्यों में हाईस्कूल और माध्यमिक स्कूलों के स्तर पर भी देखा जाता है। हर राज्य में अलग-अलग बोर्ड हैं, जिनमें सिलेबस के स्तर पर भारी अंतर है।
निम्न और उच्च स्तर पर समूचे देश में एक तय पाठ्यक्रम हो और उसमें पढ़ाई जाने वाली सामग्री भी समान और सारगर्भित होनी चाहिए। तभी ऐसे विवादों से बचा जा सकता है। हालांकि देश में समूची शिक्षा प्रणाली में ही व्यापक सुधार की जरूरत है। अंग्रेजों द्वारा बनाया गया शिक्षा का प्रारूप बस डिग्रीधारियों की फौजा खड़ा कर रहा है। कम बजट और अनदेखी के कारण आज हमारे शिक्षण संस्थानों का स्तर लगातार गिर रहा है। साथ ही गुणवत्ता के मानकों पर भी वे खरा नहीं उतर पा रहे हैं। जाहिर है, ऐसे शिक्षण संस्थानों से निकलने के बाद छात्रों को रोजगार मिलने की गारंटी नहीं होती है।
छात्र अधकचरी शिक्षा लेकर बाहर निकल रहे हैं, जिनका बाजार में कोई मोल नहीं होती है। एसोचैम के अनुसार देश के तकनीकी और प्रबंधन संस्थानों से निकलने वाले मात्र 30 फीसदी छात्र ही नौकरी पाने के काबिल होते हैं। तो सवाल उठता है कि हम किस तरह के कौशल का विकास कर रहे हैं। ज्ञान के क्षेत्र में हम ऐसे पाठ्यक्रमों, सिलेबस व शिक्षण संस्थानों के बल पर दुनिया से मुकाबला नहीं कर सकते हैं। अभी देश में 700 विश्वविद्यालय और 35,539 कॉलेज हैं, लेकिन दुनिया के शीर्ष दो सौ में एक भी विश्वविद्यालय नहीं है। बेहतर होगा कि पाठ्यक्रमों के नाम पर झगड़ा करने की बजाय समूची शिक्षा प्रणाली में सुधार कर विश्वविद्यालयों और संस्थानों की गुणवत्ता बेहतर की जाए।
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