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लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं कथनी-करनी का यह फर्क

यही हाल महंगाई और कालेधन को लेकर भी है। आखिर क्यों कांग्रेस उपाध्यक्ष इस पर सीधी बात करते नहीं दिखते हैं।

लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं कथनी-करनी का यह फर्क
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नई दिल्ली. भारतीय लोकतंत्र के महाकुंभ में छोटे-बड़े सभी दलों के उम्मीदवार अपनी-अपनी किस्मत आजमाने को मैदान में हैं। आम चुनावों में चुने हुए जनप्रतिनिधियों के कंधों पर भारतीय लोकतंत्र को आगे ले जाने और इसके सुनहरे कल के निर्माण की चुनौती होगी। परंतु चुनावों के दौरान जिस तरह से देश में नफरत फैलाने वाले भाषण दिये जा रहे हैं, वह शर्मनाक है। सहारनपुर से कांग्रेस के लोकसभा प्रत्याशी रहमान मसूद ने भाजपा के प्रधानमंत्री उम्मीदवार नरेंद्र मोदी की बोटी बोटी करने की जो धमकी दी है उसे सभ्य लोकतांत्रिक देश कभी भी स्वीकार्य नहीं करेगा। इसकी जितनी निंदा की जाए कम है।
ऊंचे पदों पर बैठे लोग जब इस तरह व्यवहार करेंगे तो नीचे के लोगों से उनका सम्मान या पालन करने की अपेक्षा ही बेमानी है। इस संबंध में अदालत ने उन्हें चौदह दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया है, क्योंकि उनका बयान एक आपराधिक कृत्य है। यह लोकतंत्र के क्षरण का एक जीता जागता नमूना भी है। पार्टियां कैसे-कैसे लोगों को उम्मीदवार बनाने लगी हैं जिनके पास न तो संयम है और न ही मर्यादा का खयाल। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी बस इतना कह कर इस मामले से पल्ला झाड़ने की कोशिश करते दिखे कि यह पार्टी की विचारधारा के खिलाफ है। उन्होंने यह भी कहा कि दरअसल यह बयान छह माह पुराना है, जब वे समाजवादी पार्टी में थे। वहीं रहमान की गिरफ्तारी के बाद पार्टी नेताओं ने कहा कि राहुल गांधी सहारनपुर नहीं जाएंगे, परंतु बाद में वे उनका प्रचार करने सहारनपुर भी गए। इस पूरे मामले में केंद्र की सत्ताधारी पार्टी के अब तक के रवैये को देखें तो कहा जा सकता है कि कांग्रेस का एक तरह से दोहरा चरित्र सामने आया है।
कुछ ही दिन बीते हैं जब लोगों ने प्रचार अभियान के दौरान यह नारा सुना होगा कि राहुल गांधी के नौ हथियार दूर करेंगे भ्रष्टाचार, परंतु कांग्रेस में टिकटों के बंटवारे की स्थिति को देखें तो पायेंगे कि जितने भी नेता भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे हैं उनमें से सुरेश कलमाडी को छोड़कर सभी को प्रत्याशी बना दिया गया है। यह कैसी सोच है, एक तरफ तो आप भ्रष्टाचार से लड़ने की बात करते हैं और दूसरी तरफ वैसे लोगों से हाथ मिलाते हैं और पार्टी का उम्मीदवार भी बनाते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि कांग्रेस की कथनी-करनी में अंतर है। और अब तो हिंसक प्रवृत्ति के लोगों को प्रत्याशी बना रही है। क्या वजह है कि राहुल गांधी यूपीए के कार्यकाल में हुए तमाम घोटालों जैसे टूजी, कोलगेट, रेलगेट, सीडब्ल्यूजी और आदर्श सोसायटी पर संसद में कुछ नहीं बोले हैं।
यही हाल महंगाई और कालेधन को लेकर भी है। आखिर क्यों कांग्रेस उपाध्यक्ष इस पर सीधी बात करते नहीं दिखते हैं। हाल ही में कांग्रेस ने लोकसभा चुनावों के लिए अपना घोषणापत्र जारी किया, जिसमें शुरुआत के करीब चौंतीस पेज में किसानों का कहीं जिक्र ही नहीं है। यह इस बात का प्रमाण है कि आज किसान कांग्रेस की प्राथमिकता में कहां हैं। यही वजह है कि जनता का कांग्रेस से मोहभंग हो रहा है। देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को समय रहते इससे सीख लेनी चाहिए। यही नहीं अन्य दलों को भी इसे एक बड़े सबक के रूप में लेना चाहिए।
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