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म्यांमार में लोकतंत्र की बही बयार

म्यांमार के संविधान के प्रावधानों को सैन्य प्रशासन ने अपने अनुरूप तोड़-मरोड़ा है।

म्यांमार में लोकतंत्र की बही बयार
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म्यांमार में आंग सान सू ची की पार्टी नेशनल लीग डेमोक्रेसी (एनएलडी) सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है। साथ ही सेना की मदद से गद्दी पर बैठे यूनियन सॉलिडेरिटी एंड डेवेलपमेंट पार्टी (यूएसडीपी) के थिन सेन को करारी हार का सामना करना पड़ा है। इसे सैन्य शासन पर लोकतंत्र की जीत के तौर पर देखा जा रहा है। रविवार को वहां के निम्न सदन के 498 सीटों के लिए मतदान हुआ था जिसमें 91 पार्टियां मैदान में थीं, लेकिन लड़ाई इन्हीं दो दलों के बीच थी। यह परिणाम इस मायने में ऐतिहासिक है कि इससे वहां पचास साल के सैन्य प्रशासन का अंत हो गया है और लोकतंत्र की नींव पड़ गई है। हालांकि इस जीत के बाद भी सू ची म्यांमार की राष्ट्रपति नहीं बन सकेंगी। दरअसल, म्यांमार के संविधान के मुताबिक विदेश में पैदा हुए बच्चों के माता-पिता देश के सर्वोच्च पद पर आसीन नहीं हो सकते। सू ची के दोनों बेटों के पास ब्रिटिश पासपोर्ट हैं। हालांकि वे पहले ही कह चुकी हैं कि जीते के बाद भले ही वे राष्ट्रपति न बनें, लेकिन वह ही सरकार चलाएंगी। यह सभी जानते हैं कि वहां के संविधान के प्रावधानों को सैन्य प्रशासन ने अपने अनुरूप तोड़-मरोड़ा है। वे सू ची को सत्ता से बाहर रखने के लिए ही ऐसे प्रावधान किए हैं।

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म्यांमार में पिछले पचास वर्षों से कठोर और अलग-थलग रहने वाले सैनिक नेतृत्व का शासन रहा है, जिसने बार-बार लोकतांत्रिक आंदोलन को दबाया। आंग सान सू ची ने वहां लोकतंत्र की स्थापना के लिए लंबा संघर्ष किया है। ढेरों यातनाएं सही हैं। वर्षों तक उनको बिना किसी वजह जेल में बंद रखा गया, नजरबंद रखा गया। इन गतिविधियों के कारण बहुत समय से म्यामांर में तनावपूर्ण स्थिति रही है। हालांकि बाद में भारी अंतरराष्ट्रीय और जन दबावों के कारण हालात कुछ सुधरने लगे। 2011 में सेना ने अप्रत्याशित तौर पर चुनाव कराकर पूर्व जनरल थिन सेन को नागरिक सरकार को सत्ता सौंप दी थी। इनकी सरकार ने कई सुधारवादी कदम उठाए जिसके कारण म्यांमार पर सेना का शिकंजा ढीला हुआ। अधिकांश राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दिया गया। शांति की राह पर चलते देख अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध भी उठाए जाने लगे जिससे उसकी अर्थव्यवस्था की हालत सुधरती दिख रही है, लेकिन सैन्य शासन के प्रति लोगों में नाराजगी थी, जो अब चुनाव के जरिए प्रकट हो गई है।

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म्यांमार हमारा महत्वपूर्ण पड़ोसी देश है। कुछ महीने पहले वहां की सरकार के सहयोग से भारतीय सेना ने उसकी सीमा में घुसकर उग्रवादियों को मौत के घाट उतारा था। ये उग्रवादी भारत में वारदात करके म्यांमार में चले जाते थे और वहां शरण ले लेते थे। इसके अलावा भी हमारे उससे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध रहे हैं। सू ची का भी भारत से बहुत भावनात्मक रिश्ता रहा है। वो दिल्ली के लेडी र्शीराम कॉलेज में पढ़ी हैं। उन्हें शांति के लिए नोबेल पुरस्कार सहित कई अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिले हैं। अब यह उम्मीद की जानी चाहिए कि उनके नेतृत्व में म्यांमार में एक लोकतांत्रिक सरकार बनेगी और भारत से रिश्तों का एक नया अध्याय शुरू होगा।

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