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टकराव नहीं विकास की राजनीति अपनाएं केजरी

दिल्ली में ही कई बार केंद्र से अलग दल की सरकार रही है और सीएम-एलजी के समन्वय से शासन-प्रशासन चला है।

टकराव नहीं विकास की राजनीति अपनाएं केजरी
एंटी करप्शन ब्यूरो (एसीबी) के अधिकार क्षेत्र को लेकर केंद्र सरकार से उलझी दिल्ली सरकार को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट से दोहरा झटका मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के लिए एक सबक है। दिल्ली हाईकोर्ट ने अपने अंतरिम आदेश में साफ कर दिया कि दिल्ली में उपराज्यपाल ही सुप्रीम संवैधानिक शक्ति है। हाई कोर्ट ने दिल्ली सरकार से अपने सभी फैसलों की जानकारी उप राज्यपाल को देने को कहा है। इस तरह से कोर्ट ने अंतिम निर्णय का अधिकार एलजी को दिया है। इस मामले को लेकर केंद्र सरकार ने भी शीर्ष अदालत में विशेष याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली सरकार को नोटिस जारी कर छह सप्ताह में जवाब देने के लिए कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के नोटिफिकेशन को संदिग्ध बताने वाली दिल्ली हाईकोर्ट की टिप्पणी को जिस तरह आधारहीन करार देकर निष्प्रभावी कर दिया। एक ही दिन में दो बड़ी अदालतों से दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल को झटका साबित करता है कि वे अपनी शक्ति को लेकर बेवजह ही उपराज्यपाल से उलझरहे थे। इससे वे क्या दिखाना चाहते थे, यह तो पता नहीं, लेकिन अहम सवाल है कि संवैधानिक शक्तियों में टकराव क्या स्वस्थ लोकतंत्र के लिए ठीक है, क्या इससे सरकार का कामकाज प्रभावित नहीं होता है, क्या इससे अपनी सरकार को लेकर जनता में भ्रम की स्थिति नहीं बनती है, जो कि अंतत: जनता के लिए ही नुकसानदायक है। केजरीवाल सरकार तो अफसरों के तबादले को लेकर भी दिल्ली के उपराज्यपाल नजीब जंग से उलझ गई। ऐसे में लग रहा है कि केजरीवाल संवैधानिक टकराव का बहाना ढूंढ़ रहे हों। वे इस मसले को जिस तरह यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि केंद्र में अलग पार्टी की सरकार होने से उपराज्यपाल के बहाने उन्हें काम नहीं करने दिया जा रहा है, तो यह सच नहीं है।
दिल्ली में ही कई बार केंद्र से अलग दल की सरकार रही है और सीएम-एलजी के समन्वय से शासन-प्रशासन चला है। दिल्ली के सीएम चाहे मदनलाल खुराना या साहिब सिंह वर्मा रहे हों या शीला दीक्षित, उनका कभी एलजी से टकराव नहीं देखा गया। दिल्ली हाई कोर्ट ने भी केंद्र सरकार से पूछा है कि वह बताए कि दिल्ली में इससे पहले सरकार कैसे चलती है और बाकी केंद्र शासित राज्यों में क्या व्यवस्था है। केजरीवाल के लिए भी दूसरे केंद्र प्रशासित राज्य भी नजीर हैं। आज दिल्ली में हम जो भी विकास, नागरिक सुविधाएं देख रहे हैं, उसमें केजरीवाल का रत्तीभर भी योगदान नहीं है, फिर कैसे कहा जा सकता है कि पहले के सिस्टम ठीक नहीं है। अभी तो केजरीवाल को यह साबित करना चाहिए कि वे बेहतर शासन देने में सक्षम हैं। ‘सुप्रीम सिंड्रोम’ लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं। असहमतियों के बीच काम करने की कला ही कुशल नेतृत्व की पहचान है। पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की लड़ाई संवैधानिक दायरे में रहकर भी लड़ी जा सकती है। अधिकारों की जंग में जनआकांक्षाओं की बलि नहीं दी सकती है। केजरी जल्द समझ लें तो ठीक।
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