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लेखन में एक युग का अंत है खुशवंत सिंह का जाना

अपने लेखन के बारे में उन्होंने कहा था कि वे बहुत बकवास लिखते हैं, पता नहीं लोग क्यों पढ़ते हैं।

लेखन में एक युग का अंत है खुशवंत सिंह का जाना
नई दिल्ली. भारतीय पत्रकारिता जगत की सबसे बुजुर्ग शख्सियत अब दुनिया में नहीं रही। जाने-माने लेखक और पत्रकार खुशवंत सिंह ताउम्र अपनी बेबाकी और बिंदासपन के लिए मशहूर रहे। पिछले साल जब वह 98 साल के हुए थे तो उन्होंने कहा था कि अब समय आ गया है कि अपने बूटों को टांगकर वह एक बार पीछे मुड़कर देखें और अंतिम यात्रा के लिए तैयार हो जाएं, लेकिन जिंदगी यह सिलसिला खत्म करने की इजाजत ही नहीं देती। उनका जन्म पंजाब के हदाली, जो कि अब पाकिस्तान में है, नामक जगह पर हुआ था। वे योजना पत्रिका के फाउंडर एडिटर रहे और इलस्ट्रेटेड वीकली ऑफ इंडिया, नेशनल हेराल्ड और हिंदुस्तान टाइम्स के संपादक रहे।
उन्होंने ट्रेन टू पाकिस्तान, आई शैल नॉट हियर द नाइटिंगल और डेल्ही जैसी क्लासिक किताबें लिखी हैं। उन्होंने दो खंडों में सिखों का इतिहास लिखा है। कुल मिलाकर उन्होंने 85 किताबें लिखी हैं। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से उनके अच्छे संबंध थे पर 1984 में अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में केंद्र सरकार की कार्रवाई के विरोध में उन्होंने पद्म भूषण सम्मान लौटा दिया था। बाद में उन्हें पद्म विभूषण सम्मान से नवाजा गया। वे 99 वर्ष के हो गए थे फिर भी संजीदगी से लिख पढ़ रहे थे। वे बहुत ही अनुशासन प्रिय व्यक्तित्व के मालिक थे। शाम को आठ बजे खाना खा लेना, नौ बजे सो जाना और फिर अगले दिन चार बजे सुबह उठ जाना और लिखना उनकी दिनचर्या थी। और जिंदगी के अंतिम सालों में तो वे प्रकृति के बेहद करीब आ गए थे। चीड़ियों और बागवानी में उनकी रुचि बढ़ गई थी, उन्होंने प्राकृतिक वातावरण पर कई किताबें भी लिखी हैं। ऐसे विरले ही लेखक होंगे जिनसे मिलने के लिए स्वयं देश का राष्ट्रपति उनके घर पहुंच जाए।
पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम बाकायदा वक्त लेकर उनसे मिलने गए थे। इस बारे में जब उनके स्टाफ ने खुशवंत सिंह को बताया तो अंत अंत तक उन्हें यकीन ही नहीं हो रहा था, लेकिन जब सुरक्षाकर्मी व्यवस्था करने पहुंचे तब वे गंभीर हुए। खुशवंत सिंह बहुत ही स्पष्टवादी थे। जो कुछ भी महसूस करते थे लिख देते थे। उनकी इस साफगोई के चलते कईलोग उनके दुश्मन बन गए थे, लेकिन खुशवंत सिंह ने किसी की परवाह नहीं की। एक साहित्यकार, पत्रकार, लेखक, इतिहासकार और आलोचक के रूप में उनका बड़ा योगदान है। खुशवंत सिंह संभवत: पहले पत्रकार-लेखक होंगे जिन्होंने जीवित रहते हुए भी स्वयं की र्शद्धांजलि लिख दी थी। वहीं अपने लेखन पर उनके जैसी टिप्पणी करने वाले कम ही लोग होंगे।
अपने लेखन के बारे में उन्होंने कहा था कि वे बहुत बकवास लिखते हैं, पता नहीं लोग क्यों पढ़ते हैं। आप उनके लेखन से सहमत या असहमत हो सकते हैं, लेकिन एक लेखक के तौर पर उनका जो योगदान है, उसकी अनदेखी नहीं कर सकते। खुशवंत सिंह अपने चुटकुलों की तासीर को लेकर विवादों में रहे। उनका बहुत-सा लेखन भी विवादों में आया, लेकिन वे कभी विचलित नहीं हुए। उन्होंने कभी अपना रास्ता नहीं बदला। उन्होंने कभी रिश्तों को भी नहीं भुनाया। आज लेखन व पत्रकारिता के क्षेत्र में कार्यरत नई पीढ़ी खुशवंत सिंह की बहुत सारी अच्छाइयों से सीख ले सकती है।
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