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संसद में छाए गतिरोध से देश का भला नहीं

विपक्षी दल कांग्रेस को मोदी सरकार को नीचा दिखाने के फेर में उन रास्तों पर जाने से बचना चाहिए जिससे देशहित प्रभावित हों।

संसद में छाए गतिरोध से देश का भला नहीं

जैसे की उम्मीद की जा रही थी, संसद के गतिरोध को तोड़ने के लिए सत्तापक्ष द्वारा सोमवार को भी बुलाई गई सर्वदलीय बैठक बेनतीजा रही। इस बीच लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने सदन की कार्यवाही में बाधा पहुंचाने के लिए कड़ा कदम उठाते हुए कांग्रेस के 25 सांसदों को पांच दिन के लिए निलंबित कर दिया। वे कई दिनों से विपक्षी दल के संसदों को हंगामे के दौरान सदन की र्मयादा को बनाए रखने की हिदायत दे रही थीं। इसके बावजूद कांग्रेसी सांसद तख्तियां लहरा रहे थे। जबकि ऐसा करना संसदीय नियमों के खिलाफ है।

यही वजह है कि लोकसभा अध्यक्ष को मजबूरन कड़ा कदम उठाने को बाध्य होना पड़ा है। लिहाजा कांग्रेस इसे विपक्ष की आवाज दबाने का जो आरोप लगा रही है, वह उचित प्रतीत नहीं होता है। मानसून सत्र के आरंभ हुए दो हफ्ते बीत गए, लेकिन सदन में एक दिन भी कामकाज नहीं हो पाया है। विपक्षी दल खासकर कांग्रेस और वामपंथी दल विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के इस्तीफे पर अड़े हुए हैं। उनका कहना हैकि इनके इस्तीफे होने के बाद ही सदन को शांतिपूर्ण तरीके से चलने देंगे।

वहीं सत्तापक्ष का कहना है कि जब उन्होंने किसी प्रकार का गलत काम नहीं किया है तो इस्तीफे का सवाल ही नहीं उठता। बेहतर होता कि संसद में कांग्रेस चर्चा में भाग लेती। सत्ता पक्ष से जवाब मांगती। यदि सरकार के जवाब में कमी दिखती तो मुद्दे को जनता के बीच ले जाती या कानून का दरवाजा खटखटाती, लेकिन इससे इतर कांग्रेस पहले इस्तीफे की मांग पर अड़ी हुई है। इसमें वामदलों को छोड़कर बाकी पार्टियां उसके साथ नहीं हैं।

शेष दल भी संसद को शांतिपूर्वक चलाना चाहते हैं। ऐसे में कांग्रेस को यह शोभा नहीं देता कि अपने जिद की पूर्ति के लिए वह दूसरे दलों की इच्छाओं की अवहेलना करे। मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए कहना कठिन है कि यह गतिरोध कब टूटेगा क्योंकि दोनों तरफ से आक्रामक रुख देखने को मिल रहे हैं। अरुण जेटली ने कहा है कि कांग्रेस को अपने नकारात्मक रवैये पर आत्मचिंतन करना चाहिए क्योंकि इससे वह देश और अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचा रही है।

वैसे भी आज वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी जैसे कई महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराने जरूरी हैं। इनके पास होने से देश के विकास के पथ पर तेजी से बढ़ने की उम्मीद है, लेकिन हंगामे के कारण ये बिल अटके रहते हैं तो इससे कुल मिलाकर देश का नुकसान ही होगा। विपक्षी दल कांग्रेस को मोदी सरकार को नीचा दिखाने के फेर में उन रास्तों पर जाने से बचना चाहिए जिससे देशहित प्रभावित हों। आज देश की जनता संसद की ओर देख रही है।

वह अपनी समस्याओं का हल चाह रही है, लेकिन सर्वोच्च पंचायत जिद के कारण ठप है। जाहिर है, इससे जनता की नजरों में संसद की गरिमा कम हो रही है। संसद में गतिरोध बरकरार रहना न तो देश के हित में है, न ही लोकतंत्र के। लिहाजा इसे समय रहते तोड़ने की कोशिश होनी चाहिए। यह सच है कि संसद चलाना सत्ता पक्ष की जिम्मेदारी है, लेकिन विपक्ष की भूमिका भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। लिहाजा वह भी संवाद के रास्ते पर चले तो कुछ रास्ता निकल सकता है।

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