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क्रायोजेनिक तकनीक में इसरो को मिली महारत

जीसैट-6 इसरो का 25वां भू-स्थैतिक संचार उपग्रह है और जीसैट श्रृंखला में यह 12वां उपग्रह है।

क्रायोजेनिक तकनीक में इसरो को मिली महारत

भारत ने बृहस्पतिवार को अपने नवीनतम संचार उपग्रह जीसैट-6 का स्वदेशी क्रायोजेनिक इंजन से लैस जीएसएलवी-डी6 रॉकेट के जरिए सफल प्रक्षेपण किया। पांच जनवरी, 2014 को हुए जीएसएलवी-डी5 के प्रक्षेपण के बाद यह दूसरा मौका है जब भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के वैज्ञानिकों ने स्वदेश में ही विकसित क्रायोजेनिक चरण का इस्तेमाल किया। जीसैट-6 इसरो का 25वां भू-स्थैतिक संचार उपग्रह है और जीसैट श्रृंखला में यह 12वां उपग्रह है। यह सेना की संचार जरूरतों को पूरा करेगा। क्रायोजेनिक तकनीक में महारत हासिल होने का अर्थ हैकि भारत अब सभी तरह के उपग्रहों के प्रक्षेपण में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो गया है। साथ ही अंतरिक्ष में दूसरे ग्रहों, उपग्रहों के लिए बड़े अंतरिक्ष मिशन भी भेज सकता है।

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दुनिया के चुनिंदा देशों जैसे अमेरिका, रूस, जापान, फ्रांस और चीन के पास ही ऐसी तकनीकी थी। दो दशक पूर्व अमेरिका के दबाव में रूस ने यह तकनीकी इसरो को देने से मना कर दिया था। तब वैज्ञानिकों ने खुद के बूते क्रायोजेनिक इंजन को साकार करने की ठानी थी। 2001 से ही देसी क्रायोजेनिक इंजन के माध्यम से जीएसएलवी का प्रक्षेपण इसरो के लिए एक गंभीर चुनौती बना हुआ था। वर्ष 2010 में ही दो बार जीएसएलवी अपने पथ से भटक गया था। वहीं 2013 में भी इसरो को मायूस होना पड़ा था जब प्रक्षेपण के करीब एक घंटे पूर्व ही रॉकेट में रिसाव होने की जानकारी मिली, तब कार्यक्रम को बीच में ही रोक दिया गया था। फिर भी इसरो ने हार नहीं मानी और उसका नतीजा है कि भारत इस जटिल तकनीकी का एक विशेषज्ञ देश बन गया है। देश पीएसएलवी से छोटे उपग्रहों को भेजने में पहले ही महारत हासिल कर चुका है, मंगलयान इसका प्रमाण है, परंतु भारी जैसे दो टन या उससे अधिक वजनी उपग्रह भेजने में हम आत्मनिर्भर नहीं थे क्योंकि इसके लिए क्रायोजेनिक इंजन वाले जीएसएलवी रॉकेट की जरूरत होती थी। इसके लिए इसरो को अन्य देशों पर निर्भर रहना पड़ता था। साथ ही भारी रकम भी चुकानी पड़ती थी, परंतु अब न केवल प्रक्षेपण खर्च को काफी कम किया जा सकेगा बल्कि अन्य देशों के उपग्रहों को स्थापित करके विदेशी मुद्रा भी अजिर्त की जा सकेगी।

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उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले दिनों में भारत की संचार और प्रसारण सेवा मजबूत होगी। अब अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए आगे की राह भी आसान हो जाएगी। 2016 में भारत अपना दूसरा चंद्रयान मिशन भेजेगा जिसमें इस रॉकेट का इस्तेमाल होना है। भारत सामरिक क्षेत्र में भी तकनीकी स्तर पर आत्मनिर्भरता प्राप्ति की ओर अग्रसर है। तकनीकी प्रगति से युवाओं में विज्ञान के प्रति आकर्षण बढ़ने के साथ वैज्ञानिकों में भी नया उत्साह आएगा। आज जिस तरह की भौगोलिक परिस्थितियां बन रही हैं, उससे निपटने के लिए भारत को आर्थिक महाशक्ति बनने के साथ तकनीकी में भी आत्मनिर्भर होना जरूरी है। इससे दुनिया में भारत अपनी धमक बढ़ा सकेगा।

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