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भारतीय कॉमिक जगत के ‘सिरमौर’ प्राण का जाना

लोकप्रिय कार्टून चरित्रों में से एक चाचा चौधरी के जनक कार्टूनिस्ट प्राण कुमार शर्मा का जाना कॉमिक विधा के लिए अपूरणीय क्षति है।

भारतीय कॉमिक जगत के ‘सिरमौर’ प्राण का जाना
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देश के सबसे लोकप्रिय कार्टून चरित्रों में से एक चाचा चौधरी के जनक कार्टूनिस्ट प्राण कुमार शर्मा, जिन्हें वाल्ट डिजनी या प्राण के नाम से जाना जाता है, का जाना कॉमिक विधा के लिए अपूरणीय क्षति है। आज जब कार्टून पत्रकारिता मुख्य पत्र-पत्रिकाओं में धीरे-धीरे हाशिए पर खिसकती जा रही है और कुछ लोगों द्वारा इसकी आड़ में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की सीमा का अतिक्रमण किया जा रहा है, ऐसे कठिन दौर में प्राण जैसे कार्टूनिस्ट की कमी निश्चित रूप से खलेगी। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी उनकी मृत्यु पर शोक जताते हुए कहा हैकि वे बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे और उन्होंने बहुतों के चेहरे पर मुस्कान बिखेरी। 60 के दशक में कार्टूनिस्ट प्राण ने जब कॉमिक स्ट्रिप बनाना शुरू किया तब वह वक्त भारत में इस लिहाज से बिल्कुल नया था कि कोई देसी किरदार मौजूद नहीं थे। देश में विदेशी कॉमिक्स चरित्रों का ही बोलबाला था। ऐसे में प्राण ने भारतीय छाप वाले पात्रों की रचना की और स्थानीय विषयों पर कॉमिक स्ट्रिप बनाना शुरू किया। उनके बनाए कार्टून चरित्र चाचा चौधरी और साबू घर-घर में लोकप्रिय किरदार बन गए। आज भी वे बच्चों के हीरो हैं। ऐसा नहीं है कि उस दौरान देश में कार्टूनिस्ट नहीं थे। शंकर, कुट्टी और अहमद जैसे कई कार्टूनिस्ट थे, लेकिन वे सब राजनीतिक कार्टून बनाते थे। प्राण देश में अकेले ऐसे कार्टूनिस्ट थे जिन्होंने सामाजिक विषयों पर कार्टून बनाए। उसके लिए बकायदा सामाजिक किरदारों को गढ़ा। यही वजह हैकि चाचा चौधरी चरित्र आज भी प्रासंगिक है। कॉमिक्स के जरिए हास्य बोध के साथ बच्चों को शिक्षाप्रद सामग्री आसानी से प्रस्तुत की जा सकती है। हालांकि बदलते वक्त के साथ बच्चों की पसंद भी बदली है, लेकिन कॉमिक्स ने भी नए मिजाज और कंटेंट के बूते नए वक्त में अपनी अहमियत कायम रखी है। 60 के दशक में कॉमिक्स का देश में सिर्फ एक ही प्रकाशक हुआ करता था। आज इनकी संख्या 20 से अधिक है। इंटरनेट और टीवी के प्रवेश ने इसे और विस्तार दिया है। पुराने कॉमिक किरदारों पर टीवी सीरियल बन रहे हैं। आज डिजिटल कॉमिक्स भी खूब प्रचलित है। चूंकि आज के बच्चे ज्यादा स्मार्ट हैं, इसलिए कॉमिक्स के कंटेंट को भी स्मार्ट बनाने और उन्हें वक्त से आगे रखने पर जोर होना चाहिए। तभी इसकी प्रासंगिकता बनी रहेगी। कार्टून पत्रकारिता की एक शाखा है। जिसमें मौजूदा हालात पर कटाक्ष किया जाता है। प्राण का स्पष्ट रूप से मानना था कि ऐसा कोई भी कार्टून जो संविधान का सम्मान न करे अच्छा कार्टून नहीं हो सकता। पर इन दिनों इसका स्तर गिरा है। कार्टूनिस्ट को संविधान की सीमाओं में रहकर ही अपनी बात कहनी चाहिए। अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर किसी की बेइज्जती कभी नहीं होनी चाहिए। आज देश में पत्रकारिता का चरित्र बदल चुका है। पत्र-पत्रिकाओं के मुख पृष्ठ से कार्टून गायब हो रहे हैं। पहले शंकर और कुट्टी इतने प्रख्यात थे कि पहले पन्ने पर उनके कार्टूनों का इंतजार होता था। अब उस स्तर के कार्टूनिस्ट भी गिनेचुने हैं। वहीं समाज में अपनी आलोचना सहने की क्षमता का भी हा्रस हो रहा है। प्राण के शब्दों में आज तो अगर कोई कार्टून बना भी दे तो तुरंत जुलूस निकलने लगते हैं।
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