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देश की सबसे पुरानी पार्टी पर संकट, सबसे बुरे वक्त का सामना कर रही है पार्टी

बीते वर्ष कांग्रेस को हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनावों में मुंह की खानी पड़ी थी। इन राज्यों में भी वह स्वयं या अपने सहयोगियों के साथ सत्ता में थी।

देश की सबसे पुरानी पार्टी पर संकट, सबसे बुरे वक्त का सामना कर रही है पार्टी
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संसद के बजट सत्र के दौरान कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी सदन में मौजूद नहीं रहेंगे। कांग्रेस की ओर से कहा गया हैकि वे आत्मचिंतन के लिए कुछ दिनों की छुट्टी पर गए हैं। हालांकि माना जा रहा है कि वे अध्यक्ष सोनिया गांधी के कई वफादार नेताओं से नाराज होकर छुट्टी पर चले गए हैं। दलअसल, राहुल गांधी खुद पार्टी का अध्यक्ष बनना चाहते हैं और अपने अनुसार फैसला लेना चाहते हैं, लेकिन सोनिया के समर्थक ऐसा नहीं होने दे रहे हैं।

सबकी सुरक्षा और सबके विकास का वादा

आजादी के बाद सबसे बुरे वक्त का सामना कर रही कांग्रेस पार्टी के अहम नेता की इस तरह महत्वपूर्ण समय में अनुपस्थिति कई सवाल पैदा करती है। उनके इस फैसले से पार्टी के कई नेता हैरान हैं। वहीं आलोचकों को यह कहने का अवसर जरूर मिल गया है कि उनकी दिलचस्पी राजनीति में नहीं है। आलोचना यहां तक की जाती हैकि वे राजनीति के लिए नहीं बने हैं। पार्टी के अंदर भी उनकी नेतृत्व क्षमता और कामकाज के तौर-तरीकों पर सवाल खड़े होते रहे हैं, क्योंकि उनके नेतृत्व में लड़े गए ज्यादातर चुनावों में कांग्रेस को हार ही मिली है। कर्नाटक के एक कांग्रेसी नेता ने कहा भी है कि राजनीति फूल टाइम काम है। इसमें छुट्टी नहीं ली जाती है। कांग्रेस की आज जो हालत है, उसे देखते हुए तो दिनरात काम करने की जरूरत है।

बजट सत्र के शांतिपूर्ण रहने की उम्मीद

दिल्ली विधानसभा के चुनावों में कांग्रेस को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली, जबकि यहां वह लगातार पंद्रह वर्षों तक सत्ता में रही। उसके 70 उम्मीदवारों में से 63 की तो जमानत तक जब्त हो गई। नौ माह पूर्व भी आम चुनावों में उसे ऐतिहासिक हार का सामना करना पड़ा था। उसे सिर्फ 44 सीटें ही मिल सकी थीं। इस तरह उसके हाथ से दस वर्ष के बाद केंद्र की सत्ता छिन गई थी। देखा जाए तो देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी का लगातार क्षरण हो रहा है। आम चुनावों के बाद अब तक जीतने भी राज्यों में चुनाव हुए हैं सभी में उसकी पराजय हुई है।

बीते वर्ष कांग्रेस को हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड और जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनावों में मुंह की खानी पड़ी थी। इन राज्यों में भी वह स्वयं या अपने सहयोगियों के साथ सत्ता में थी। कई राज्यों में जहां वह लंबे समय तक सत्ता में रही, अब मुख्य विपक्षी पार्टी भी नहीं रह गई है। यानी तीसरे और चौथे नंबर की पार्टी बन कर रह गई है। आज कांग्रेस महज नौ राज्यों में ही सिमट कर रह गई है। इसमें कर्नाटक को छोड़ दें तो बाकी राज्य बहुत ही छोटे हैं और राजनीतिक रूप से वे बहुत महत्वपूर्ण नहीं हैं। पंजाब से लेकर महाराष्ट्र और हरियाणा में गुटबाजी भी चरम पर है। कई दिग्गज नेता पार्टी छोड़ चुके हैं या छोड़ने की सोच रहे हैं।

दरअसल, कांग्रेस के इस हालत के लिए उसके पास मजबूत नेतृत्व का अभाव माना जा रहा है। राहुल गांधी के नेतृत्व में उन्हें अपना भविष्य सुरक्षित दिखाई नहीं दे रहा है। हालांकि राहुल गांधी का कहना हैकि पहले उन्हें खुलकर फैसला लेने का अधिकार दिया जाए, फिर नेतृत्व की कसौटी पर कसा जाए। मौजूदा समय में वे पार्टी उपाध्यक्ष हैं। लिहाजा, यह मानने का कोईकारण नहीं है कि पार्टी में उनकी नहीं चलती। उनके नेतृत्व में कांग्रेस लगातार सिमट रही है। साफ है कि वे नेतृत्व की कसौटी पर खरा नहीं उतर पा रहे हैं। कांग्रेस अपना खोया हुआ आधार वापस पा सकती है, यदि वह अपने इस संकट को दूर करे। अन्यथा उसे इससे भी बुरा दौर देखने को तैयार रहना होगा।

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