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चिंतन: सरकारी बैंकों के घाटे पर अंकुश की जरूरत

पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही में पीएनबी को 307 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था।

चिंतन: सरकारी बैंकों के घाटे पर अंकुश की जरूरत
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कॉरपोरेट इकॉनोमी में सरकार की नियामकीय लापरवाही का झटका लगना शुरू हो गया है। देश के दूसरे सबसे बड़े सरकारी बैंक पीएनबी को भारतीय बैंकिंग इतिहास का सबसे बड़ा तिमाही घाटा हुआ है। वित्त वर्ष 2015-16 की चौथी तिमाही (जनवरी-अप्रैल) में पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) को 5367 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ा है। खास बात यह है कि पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही में पीएनबी को 307 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था। इस तिमाही में पीएनबी की ब्याज आय 27 फीसदी घटकर 2768 करोड़ रुपये रही, जबकि पिछले वित्त वर्ष की इसी तिमाही में पीएनबी की ब्याज आय 3792 करोड़ रुपये रही थी।

पीएनबी को हुए इस घाटे के लिए प्रोविजनिंग में बढ़त को वजह बताई जा रही है। प्रोविजनिंग वह रकम होती है, जो नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स (एनपीए) के असर से बचने के लिए बैंक अलग से रखते हैं। पीएनबी की प्रोविजनिंग पिछले साल के मुकाबले 2.7 गुना बढ़कर जनवरी-मार्च तिमाही में 10,485 करोड़ रुपये हो गई। पिछले साल इसी तिमाही में बैंक ने 3834 करोड़ रुपये की प्रोविजनिंग रखी थी। इस तिमाही में पीएनबी का ग्रॉस एनपीए 34,338 करोड़ रुपये से बढ़कर 55,818 करोड़ रुपये हो गया। घाटा उठाने वाले सरकारी बैंक पीएनबी अकेले नहीं है।

इसी तिमाही में सरकारी बैंक यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया को भी 413 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है, जबकि पिछले वित्त वर्ष 2015 की इसी तिमाही में बैंक को 104.5 करोड़ रुपये का मुनाफा हुआ था। इस बैंक की प्रोविजनिंग भी 457.8 करोड़ रुपये से बढ़कर 1173.4 करोड़ रुपये रही। इसको भी ग्रॉस एनपीए बढ़ने से घाटा हुआ है। एनपीए के प्रभाव से बचने के लिए प्रोविजनिंग बढ़ने के चलते सरकारी क्षेत्र के ही सिंडिकेट बैंक को भी जनवरी- मार्च तिमाही में 2158 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। प्रोविजनिंग के चलते इस साल अब तक सरकारी बैंकों को 14 हजार करोड़ रुपये का नुकसान हो चुका है। यह नुकसान सरकारी क्षेत्र के बैंकों के लिए बड़ी दस्तक है। ऐसा नहीं है कि बैंकों का एनपीए एक दिन में ही बढ़ा है। जबसे भारत ने आर्थिक उदारीकरण की नीति को अपनाया है, सरकारी बैंकों का एनपीए बढ़ता गया है।

आज करीब पांच लाख करोड़ रुपये का एनपीए हो गया है। केवल पांच बड़ी कॉरपोरेट कंपनियों पर ही करीब ढाई लाख करोड़ रुपये का बड़ा कर्ज है। इनमें किंगफिशर का नाम नहीं है। लिकर किंग विजय माल्या का किंगफिशर एयलाइंस कर्ज प्रकरण एनपीए का बहुत छोटा मामला है। कर्ज वसूली के लिए साफ्टा कानून है, फिर भी वसूली नहीं हो पा रही है। एनपीए बढ़ने के पीछे कॉरपोरेट और राजनीति के बीच कथित गठजोड़ को एक कारण माना जाता रहा है। इधर, कुछ सालों में रिर्जव बैंक की चेतावनी के बावजूद सरकार ठोस नियामकीय उपाय नहीं कर पाई है।

सरकार बजट में बैंकों को अपने खजाने से नई पूंजी उपलब्ध करवाकर एनपीए के चलते होने वाले किसी असर को ढंकने की कोशिश करती रही है। लेकिन यह मुकम्मल उपाय नहीं है। आज विजय माल्या देश के कानून और राजनीति का ही फायदा उठाकर बैंकों को झांसा दे रहे हैं। खराब लोन वाले सबप्राइम संकट के चलते ही अमेरिकी बैंकिंग सेक्टर को बड़ा नुकसान उठाना पड़ा था, लेहमैन ब्रदर्स जैसे स्थापित बैंक डूब गया था। डूबत कर्ज के चलते ही स्पेन सरकार दिवालिया के कगार पर पहुंच गई थी। कॉरपोरेट इकॉनोमी में डूबत कर्ज का दंश मेक्सिको बहुत पहले झेल चुका है। भारत सरकार को चाहिए कि एनपीए से निपटने के लिए सख्त नियामकीय उपाय करे। मोदी सरकार ने दिवालिया कानून में बदलाव तो किया है, लेकिन देखने वाली बात होगी कि एनपीए कम करने में कितनी मदद मिलेगी।

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