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चुनावी माहौल बिगाड़ने की हिंसक कोशिश

लोग नरेंद्र मोदी को देखे के लिए कई घंटों पहले से पहुंचे मौदान में।

चुनावी माहौल बिगाड़ने की हिंसक कोशिश
नई दिल्ली. चुनावों के दौरान प्राय: लोकतंत्र विरोधी ताकतें माहौल को खराब करने की कोशिश करती रहती हैं। ऐसे में वे जगह-जगह हिंसक वारदातों को अंजाम देती हैं, इस तरह वे चुनाव आयोग के कामकाज में बाधा पहुंचाकर चुनाव को पारदर्शी व निष्पक्ष नहीं होने देना चाहती हैं, परंतु भारत में वे कभी भी अपने इस मकसद में कामयाब नहीं हो सकी हैं।
भारतीय लोकतंत्र आज अपने अहम पड़ाव पर है। छह दशक से उसकी विकास यात्रा अनवरत जारी है। लोगों का विश्वास ही है कि पूरा देश चुनावी रंग में रंगा हुआ है। सात चरणों के मतदान संपन्न हो चुके हैं। और जिस तरह से रिकॉर्ड मतदान हो रहा है, उससे भारत विरोधी शक्तियों का हताश होना लाजमी है। बृहस्पतिवार को तमिलनाडु के चेन्नई मध्य रेलवे स्टेशन पर गुवाहाटी बंगलुरु एक्सप्रेस में एक के बाद एक दो बम धमाका होना भी इसी तरह की घटना है।
हालांकि दोनों बम कम क्षमता के बताये जा रहे हैं। लिहाजा मकसद दहशत फैलाना हो सकता है। हालांकि अभी इसके मॉड्यूल और बम में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों के बारे में ज्यादा जानकारी नहीं मिली हैपर सुरक्षाकर्मी इसे आतंकी साजिश से भी जोड़ रहे हैं। चुनावों में बाधा पहुंचाने के लिए नक्सली हिंसक वारदातों को अंजाम देते रहे हैं, परंतु अब यदि आतंकी भी इस तरह लोकतंत्र के उत्सव को खराब करने लगे तो यह देश के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए, लेकिन बम धमाके की जांच के लिए जिस तरह से केंद्र और राज्य सरकार में खींचतान देखी जा रही है वह ठीक नहीं है। जांच से ही धमाके का सच पता चलेगा और इसके लिए बेहतर एजेंसी को इसका जिम्मा सौंपा जाना चाहिए।
राज्य सरकार का मामले को एनआईए को नहीं सौंपने पर अड़ना दुर्भाग्यपूर्ण है। यह धमाका जहां हुआ है उससे थोड़ी ही दूरी पर भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी एक दिन पहले रैली कर चुके हैं। इससे पूर्व भी पटना में उनकी रैली में आतंकी धमाका कर चुके हैं। अभी हाल ही में आईएम के पकड़े गए आतंकियों ने यहकबूला है कि मोदी उनके निशाने पर हैं। ये घटनाएं हमें सीख देती हैं कि अब अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है, जिससे भारत विरोधी या लोकतंत्र विरोधी शक्तियां अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाएं।
हालांकि जिस तरह से चुनाव प्रचार के दौरान नेता अपने विरोधियों पर जुबानी हमले कर रहे हैं और इस दौरान सारी र्मयादाओं को तोड़ रहे हैं उससे भी उन ताकतों को साहस मिल रहा है। उन्हें यह समझना होगा कि राजनीतिक विरोधियों को शत्रु के रूप में पेश करने से समाज पर भी बुरा असर पड़ता है। ऐसे में जब दूसरे देश यह देखते हैं कि यहां की पार्टियां एक-दूसरे को नीचा दिखाने के लिए सारी हदों को तोड़ रही हैं तो उन्हें भी गैरजरूरी टिप्पणी करने का अवसर मिल जाता है। गत दिनों पाक के गृहमंत्री निसार अली खान और सेना प्रमुख राहिल शरीफ का देश के आंतरिक मामलों पर भड़काऊ बयान इसका उदाहरण हैं। चुनावों के दौरान ऐसे बयान नहीं दिए जाने चाहिए। इससे आतंकियों को हौसला मिल सकता है और वे हिंसा पर उतारू हो सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो दोनों पड़ोसी देशों के बीच तनाव बढ़ सकता है।

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