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बगावत के मूड में क्यों हैं कांग्रेस के दिग्गज

हरियाणा कांग्रेस में गुटबाजी आम बात हो गई है।

बगावत के मूड में क्यों हैं कांग्रेस के दिग्गज
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देश की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी कांग्रेस अपने सबसे मुश्किल दौर से गुजर रही है। लोकसभा चुनावों के परिणाम सामने आने के बाद से उसका संकट और भी गहरा गया है। केंद्र की राजनीति से लेकर कई राज्यों में आंतरिक कलह खुलकर सामने आने लगे हैं। कहीं उसके पार्टी के नेता बगावत के मूड में हैं तो कहीं गुटबाजी चरम पर है। एक तरफ वह लोकसभा में विपक्षी पार्टी का दर्जा पाने के लिए जद्दोजहद कर रही है तो दूसरी तरफ उसके पुराने सहयोगी एक-एक कर उसका साथ छोड़ रहे हैं। सोमवार को महाराष्ट्र मेंउसके कद्दावर नेता और उद्योग मंत्री नारायण राणे ने अपनी सरकार के मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। हालांकि वे कांग्रेस में बने रहेंगे। वहीं राज्य में उसकी सहयोगी एनसीपी के साथ गठबंधन को लेकर अनबन की बात सामने आ रही है।
नारायण राणे लोकसभा चुनाव परिणाम के बाद से ही प्रदेश में शीर्ष नेतृत्व में बदलाव की मांग कर रहे थे। उनका आरोप हैकि पार्टी ने उन्हें नजरअंदाज किया है। हालांकि इसके पीछे उनकी महत्वाकांक्षा भी है। कोंकण इलाके के बड़े नेता नारायण राणे इससे पहले विलासराव देशमुख और अशोक चव्हाण के नेतृत्व की लंबे समय तक आलोचना करते रहे थे। कांग्रेस में शामिल होने से पहले राणे शिवसेना में थे। उन्होंने कहा हैकि कांग्रेस में आने के दौरान उन्हें छह माह में राज्य का मुख्यमंत्री बनाने की बात हुई थी पर नौ साल के बाद भी उन्हें यह पद नहीं मिला है। महाराष्ट्र में इसी साल चुनाव होने हैं और उनके इस कदम से पहले से बदहाल कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में मुंह की खानी पड़ सकती है। बीते लोकसभा चुनावों में उसका प्रदर्शन काफी खराब रहा था। वहीं असम में भी नेतृत्व परिवर्तन की मांग तेज हो गई है। सोमवार को वहां के शिक्षा मंत्री हिमांता शर्मा ने इस्तीफा दे दिया और जिस तरह से तीस विधायकों के दल ने राज्यपाल से मिलकर मुख्यमंत्री तरुण गोगोई को हटाने की मांग की है उससे कांग्रेस नेतृत्व के सामने एक नई मुश्किल खड़ी हो गई है। राज्य में आसन्न चुनाव को देखते हुए पार्टी में इस असंतोष का क्या परिणाम होगा, सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।
हरियाणा कांग्रेस में गुटबाजी आम बात हो गई है। कांग्रेस के दिग्गज नेता बीरेंद्र सिंह ने साफ कह दिया है कि यदि अक्तूबर में होने वाले विधानसभा चुनाव से पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा को हटाया नहीं गया तो वे चुनाव नहीं लड़ेंगे। वहीं सहयोगी दल भी कांग्रेस का साथ छोड़ रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि कांग्रेस के साथ रहने से मतदाताओं की नाराजगी का शिकार होना पड़ सकता है। इसकी एक झलक रविवार को जम्मू-कश्मीर में देखने को मिली जब नेशनल कॉन्फ्रेंस से वर्षों पुराना उसका गठबंधन टूट गया। कांग्रेस का कहना है कि उसने स्वयं गठबंधन तोड़ने का फैसला लिया है जबकि नेशनल कॉन्फ्रेंस के उमर अब्दुल्ला कह रहे हैं कि उन्होंने गठबंधन से अलग होने के अपने फैसले के बारे में दस दिन पूर्व ही सोनिया गांधी को अवगत करा दिया था। वहीं गुलाम नबी आजाद पर मनमानी का आरोप लगाते हुए राज्य के उधमपुर के पूर्व कांग्रेसी सांसद चौधरी लाल सिंह ने पार्टी छोड़ दी है। उत्तर प्रदेश और बिहार सहित कई राज्यों में कांग्रेस पहले ही हाशिए पर पहुंच गयी है। अब इन चार राज्यों में नेताओं के बीच आपसी मनमुटाव, गुटबाजी और सहयोगियों के साथ अनबन कहीं किसी अनहोनी की आहट तो नहीं हैं। बहरहाल, कांग्रेस को अपनी उपस्थिति कायम रखनी है तो गहन सोच-विचार कर कदम उठाने होंगे।
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