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चिंतन: कांग्रेस के समक्ष अस्तित्व बचाने का गंभीर संकट

कर्नाटक के अलावा आज कोई भी बड़ा राज्य कांग्रेस के पास नहीं है।

चिंतन: कांग्रेस के समक्ष अस्तित्व बचाने का गंभीर संकट
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पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा के 'कांग्रेस मुक्त भारत' अभियान की जमीन को एक तरह से और मजबूती दी है, तो कांग्रेस के सामने राष्ट्रीय दल के रूप में अस्तित्व बचाने का गंभीर संकट खड़ा कर दिया है। एक समय था जब 14 से 15 राज्यों में कांग्रेस का शासन हुआ करता था, केंद्र की सत्ता पर भी दस साल से काबिज थी, लेकिन इधर तीन से चार साल में कांग्रेस सिकुड़कर चार-पांच छोटे राज्यों तक सीमित हो गई है।

कर्नाटक के अलावा आज कोई भी बड़ा राज्य कांग्रेस के पास नहीं है। उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, मेघालय, मणिपुर जैसे छोटे राज्यों में कांग्रेस टिमटमा रही है। कांग्रेस नीत यूपीए भी केवल बिहार में सत्ता में है। इस विस चुनाव में असम और केरल भी कांग्रेस के हाथ से चली गई। तमिलनाडु में डीएमके के साथ वापसी की उम्मीद थी, वो भी जयललिता की आंधी में उड़ गई। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी के सामने लेफ्ट से गठबंधन भी कांग्रेस के काम नहीं आया। ले-देके पुडुच्चेरी में कांग्रेस डीएमके के साथ सत्ताधारी एन रंगास्वामी की एआईएनआरसी को हराकर लाज बचाने में सफल रही। अब इस विस चुनाव के बाद अब कांग्रेस का शासन केवल छह फीसदी आबादी तक सिमट गया है।

जबकि इसके उलट भाजपा और मजबूत हुई है। असम में भाजपा, असम गण परिषद और बोडो पीपुल्स फ्रंट के गठबंधन ने जोरदार सफलता हासिल की है। पार्टी ने इसी तरह कर्नाटक में जीत दर्ज कर दक्षिण के राज्यों में अपना खाता खोला था। असम में भाजपा की यह जीत पार्टी के लिए पूवरेत्तर का द्वार खोलने वाली सिद्ध होगी। यहां भाजपा सरकार का कामकाज सेवन सिस्टर्स के राज्यों-अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, नगालैंड, त्रिपुरा और सिक्किम में भी पार्टी के लिए जनाधार बढ़ाएगा। इसके साथ ही देरसबेर पश्चिम बंगाल को भी प्रभावित कर सकता है।

इस बार पश्चिम बंगाल में पहली बार भाजपा को 10 सीटें मिलना बड़ी बात है। आज मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, झारखंड, हरियाणा, छत्तीसगढ़, गोवा में भाजपा की सरकार है, तो आंध्र प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, अरुणाचल प्रदेश में एनडीए की सरकार है। इस समय भाजपा देश की करीब 37 फीसदी आबादी पर शासन कर रही है। अगले साल भी पांच राज्यों उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब, गोवा व मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं, इनमें कहीं भी कांग्रेस के आने की उम्मीद नहीं है। आखिर कांग्रेस की यह दशा क्यों होती जा रही है, पार्टी के लिए चिंतनीय है।

पार्टी नेतृत्व, विचारधारा और एजेंडा किसी भी स्तर पर भाजपा से रेस में नहीं दिखाई दे रही है। कांग्रेस के इस हर्श के लिए उसकी नकारात्मक व अहंकारी राजनीतिक शैली और भ्रष्टाचार में डूबी पार्टी की छवि भी जिम्मेदार है। कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी जनता के बीच अपनी पैठ नहीं बना पा रहे हैं। विरोधियों को साधने के लिए कांग्रेस जिस तरह सीबीआई का दुरुपयोग करती रही है, पूरा देश जानता है। जीएसटी बिल में अड़ंगा डालने के बाद तो जैसे जनता में उसकी पोल ही खुल गई है। अब देखने वाली बात होगी कि कांग्रेस अपना अस्तित्व कैसे बचाती है?

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