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चिंतन: फिर सामने आई कांग्रेस नेतृत्व की असहिष्णुता

यह तो जगजाहिर है कि कांग्रेस पर वंशवाद हावी है।

चिंतन: फिर सामने आई कांग्रेस नेतृत्व की असहिष्णुता
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कांग्रेस की असहिष्णुता फिर सामने आई है। 131वें स्थापना दिवस पर पार्टी की महाराष्ट्र इकाई की पत्रिका कांग्रेस संदेश में छपे लेखों में प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और वर्तमान कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बीते कल को उकेरा गया है। इसमें जो बातें कही गई हैं आमतौर पर कांग्रेस उन पर चर्चा से परहेज करती है।
लेख में पंडित नेहरू की जम्मू-कश्मीर, चीन और तिब्बत पर नीतियों की आलोचना की गई है। कहा गया है कि यदि वे सरदार वल्लभ भाई पटेल की सलाह के अनुसार काम करते तो आज परिस्थितियां अलग होतीं। दरअसल, नेहरू कश्मीर रियासत के भारत में विलय के मामले को स्वयं हल करना चाहते थे, लेकिन इसमें वे पूरी तरह सफल नहीं हो सके।
पाकिस्तान आज भी प्रदेश पर अपना हक जताता है। इसी तरह वे तिब्बत के मामले में भी पड़ोसी देश की कुटिलता नहीं भांप पाए थे। जबकि सरदार पटेल आरंभ से ही उन्हें आगाह करते रहे। वहीं सोनिया गांधी के संबंध में कहा गया है कि उनके पिता स्टेफिनो मायनो फासिस्ट सेना में शामिल थे।
सोनिया गांधी कांग्रेस का सदस्य बनने के महज 62 दिनों बाद ही पार्टी अध्यक्ष बन गईं। बहरहाल, देखा जाए तो दोनों के संबंध में इन बातों का जिक्र बहुत पहले से ही होता रहा है। इस तरह के लेख छापने के लिए अपने मुखपत्र के संपादक को बर्खाश्त कर कांग्रेस अपनी संकीर्ण सोच जाहिर कर दी है।
बेहतर होता कि पार्टी इन आलोचनाओं का जवाब देती। आमतौर पर देखा जाता है कि इतिहास का मूल्यांकन लोग अपने अपने नजरिए से करते हैं। ऐसे में उचित ही है कि पंडित नेहरू के दौर को लोग अलग अलग ढंग से देखें। इसी तरह सोनिया गांधी के पिता के संबंध में भी पार्टी तर्क दे सकती है कि इसमें कांग्रेस अध्यक्ष की कोई भूमिका नहीं है।
यह तो जगजाहिर है कि कांग्रेस पर वंशवाद हावी है। वह नेहरू-गांधी परिवार की पार्टी बनकर रह गई है। जहां वही होता है जो हाईकमान या सुप्रीमो की मंशा होती है। हालांकि वंशवाद सिर्फ कांग्रेस की राजनीतिक संस्कृति का हिस्सा नहीं है, अब यह अधिकांश दलों के अंदर मौजूद है। इसने पार्टी के अंदर लोकतांत्रिक विचार-विर्मश के सामने अवरोध पैदा किया है।
कांग्रेस के लिए अच्छा होता कि वह इस मामले में पार्टी के अंदर ही विचार रखने का अवसर देती। इससे उसके वैचारिक व सांगठनिक आधार मजबूत होते, लेकिन बजाय इसके उसने असहनशीलता का परिचय दिया है। संपादक पर कार्रवाई से यही संदेश जा रहा है कि कांग्रेस नेतृत्व में अपनी आलोचना सुनने का साहस नहीं है।
सोनिया और राहुल गांधी अपने को इससे ऊपर मानते हैं। आखिर इसे ही तो असहिष्णुता कहते हैं। कहां तो कांग्रेस मोदी सरकार पर असहिष्णु होने का ढोल पीट रही थी, लेकिन अब तो यही लग रहा है कि कांग्रेस सबसे ज्यादा असहिष्णु है। कांग्रेस के अंदर इस कदर असहनशीलता है कि वह भारत की जनता द्वारा चुने हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बर्दाश्त नहीं कर पा रही है।
सोनिया और राहुल गांधी उन्हें नीचा दिखाने के अवसर खोजते रहते हैं। दोनों के इशारे पर ही आज कांग्रेस के नेता संसद को नहीं चलने दे रहे हैं। जिससे वहां काम काज ठप पड़ा है। इन सबका खामियाजा देश को भुगतना पड़ रहा है। बेहतर होगा कि दूसरों को असहिष्णु ठहराने की बजाय कांग्रेस नेतृत्व अपने गिरेबान में झांके।
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