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आखिर विरोध किस लिए सवालों के घेरे में कांग्रेस

अंग्रेजों के जमाने में 1894 में जो भूमि अधिग्रहण अधिनियम बना, उसी के तहत कांग्रेस की सरकारें करीब एक सौ बीस साल तक यानी 2013 तक भूमि अधिग्रहित करती रहीं।

आखिर विरोध किस लिए सवालों के घेरे में कांग्रेस
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देश पर करीब साठ साल तक राज करने वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ऐसे मुद्दों को लेकर संसद और उसके बाहर हमलावर मुद्रा में नजर आ रही है, जो नैतिक दृष्टि से देखें तो उसी के खिलाफ जाते हुए दिखते हैं। अंग्रेजों के जमाने में 1894 में जो भूमि अधिग्रहण अधिनियम बना, उसी के तहत कांग्रेस की सरकारें करीब एक सौ बीस साल तक यानी 2013 तक भूमि अधिग्रहित करती रहीं। 2013 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए-2 सरकार ने जल्दबाजी में जो अधिनियम संसद से पारित कराए, उनमें नया भूमि अधिग्रहण बिल भी शामिल है।

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कमाल की बात तो यह है कि 2013 और 2014 में इस बिल के पारित होने के बाद राज्य सरकार भूमि अधिग्रहण करने में नाकाम सिद्ध हुई, क्योंकि इसमें ऐसे-ऐसे प्रावधान कर दिए गए हैं, जिनके चलते अधिग्रहण आसान नहीं रह गया है। केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार ने उसके ऐसे प्रावधानों को खत्म करने का फैसला किया। वह नया बिल लेकर संसद में आई है। विपक्ष के एतराज को देखते हुए उसने लोकसभा में इसे पारित करने से पहले नौ संशोधन भी किए परन्तु कांग्रेस इस जिद पर अड़ी है कि पिछले साल उसने जो विधेयक बनाया था, मौजूदा सरकार उसी के साथ काम करे।

प्रधानमंत्री कांग्रेस सहित विरोध कर रहे बाकी दलों को चुनौती दे चुके हैं कि वे बहस करें और बताएं कि प्रस्तावित नए विधेयक में किसान विरोधी कौन सी बातें हैं? उनका कहना है कि ग्रामीण क्षेत्रों के सर्वांगीण विकास के लिए भूमि अधिग्रहण जरूरी है। इसके बिना वे उन घोषणाओं को जमीन पर नहीं उतार सकते, जो उन्होंने की हैं। बहरहाल, कांग्रेस और दूसरे दल विरोध पर अड़े हुए हैं। यूथ कांग्रेस ने इसी के सापेक्ष्य में सोमवार को दिल्ली की सड़कों पर प्रदर्शन भी किया।

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दूसरा मुद्दा अहम लोगों की सुरक्षा व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। कुछ दिन पहले दिल्ली पुलिस ने राहुल गांधी की सुरक्षा से जुड़े पहलुओं की तहकीकात की थी। ऐसी तहकीकात प्रणब मुखर्जी, अटल बिहारी वाजपेयी, इंद्र कुमार गुजराल, एचडी देवेगौड़ा, सोनिया गांधी से लेकर तमाम अहम नेताओं की हो चुकी है, जिनकी संख्या पांच सौ से ऊपर है परन्तु कांग्रेस ने इसे अलग ही रंग और मोड़ देते हुए दोनों सदनों में हंगामा किया। कहा कि मोदी सरकार राहुल गांधी की जासूसी करा रही है? राज्यसभा में सदन के नेता और वित्त मंत्री अरुण जेटली ने स्पष्ट किया कि यह कवायद 1957 से होती आ रही है।

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इसमें कुछ भी नया नहीं है। मनमोहन काल में भी सोनिया गांधी सहित तमाम नेताओं के पोर्टफोलियो से जुड़ी जानकारी जुटाई जाती रही है। इसके बावजूद यदि कांग्रेस सदन से वाकआउट करती नजर आती है तो कहना पड़ेगा कि छह दशक तक देश पर राज करने वाली कांग्रेस पूरी तरह दिशाभ्रम की शिकार हो चुकी है। वह ऐसे मुद्दों पर बेवजह सरकार की राह का रोड़ा बनने की कोशिश कर रही है, जिस पर वह खुद ही सवालों के घेरे में है।

असल में तो कांग्रेस से ही इन दोनों मुद्दों पर सवाल पूछे जाने चाहिए। भूमि अधिग्रहण और सुरक्षा जांच के तौर-तरीकों पर कटघरे में तो कांग्रेस खुद ही खड़ी दिखाई दे रही है।

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