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लोकतंत्र में मतभेद ठीक मनभेद होना ठीक नहीं

दलों के बीच मनभेद पैदा हो जाए तो लोकतंत्र की गाड़ी एकहद तक रुक जाती है।

लोकतंत्र में मतभेद ठीक मनभेद होना ठीक नहीं
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लोकतंत्र में विभिन्न राजनीतिक पार्टियों के बीच वैचारिक विरोध होना आम बात है। एक समृद्ध लोकतंत्र की पहचान उसमें विविध मतों की ज्यादा से ज्यादा उपस्थिति से जुड़ी होती है। जब अलग-अलग विचारों के हिमायती एकजुट होकर कोई फैसला लेते हैं तो वह समाज के हर वर्ग के लिए लाभदायक होता है। वहीं यदि दलों के बीच मनभेद पैदा हो जाए तो लोकतंत्र की गाड़ी एकहद तक रुक जाती है। इससे न सिर्फ पूरा समाज प्रभावित होता है, बल्कि उसकी विकास यात्रा भी धीमी हो जाती है। अंतत: इससे देश का अहित होता है। ये बातें इन दिनों केंद्र में मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस पर सटीक बैठती प्रतीत हो रही हैं। हाल तक भाजपा नीत एनडीए सरकार ने उम्मीद लगाई थी कि वह नकारात्मक राजनीति छोड़ देशहित को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) बिल को पारित कराने के लिए आगे आएगी, लेकिन उसने इसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। लिहाजा गत दिनों केंद्र सरकार ने संसद के मानसून सत्र का सत्रावसान कर दिया।

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जाहिर है, अब जीएसटी बिल शीत सत्र में ही आ पाएगा, लेकिन हालात को देखते हुए इसकी संभावना कम ही दिखाई दे रही हैकि कांग्रेस उस दौरान भी सहयोगात्मक रुख अपनाएगी। वह अभी भी सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान के इस्तीफे की बात कर रही है। जबकि बीते सत्र में इन पर व्यापक चर्चा हो चुकी है। यह स्पष्ट हो गया हैकि कांग्रेस के आरोप निराधार हैं। ऐसे में इन मुद्दों को खत्म मान लिया गया है। मानसून सत्र को कांग्रेसी सांसदों ने अपने जिद के कारण किस तरह बंधक बनाए रखा, इसे समूचे देश ने देखा है। संसद का पूरा सत्र उनके हंगामे की भेंट चढ़ गया जिससे देश के सामने पैदा हुए ज्वलंत मुद्दे अछूते रह गए। उन पर देश की सर्वोच्च पंचायत चर्चा तक नहीं कर पाई। संसद का एक महत्वपूर्ण काम कानून बनाना होता है, वह भी नहीं हो पाया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा है कि कांग्रेस संसद को ठप कर देश के विकास की गति को रोकने की साजिश कर रही है। उसका व्यवहार लोकतंत्र के हित में नहीं है। देश की प्रगति के लिए संसद को सुचारू रूप से चलाना हर पार्टी का धर्म होता है।

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ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस अपनी हार पचा नहीं पा रही है और वह अभी भी नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री के रूप में स्वीकारने को तैयार नहीं है। गत लोकसभा चुनावों में मिली ऐतिहासिक हार से उसे सीख लेनी चाहिए, जब वह 44 सीटों पर सिमट गई। एक-एक राज्य उसके हाथ से निकलते जा रहे हैं। बीते करीब एक साल में वह पांच राज्यों में चुनाव हार चुकी है। आज केरल, कर्नाटक और पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों में ही उसकी मौजूदगी बची है। कर्नाटक को छोड़ दें तो बाकी राज्य राजनीतिक रूप से ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं हैं। ऐसे में कांग्रेस को विकास कायरें में बाधक बनने के बजाय अपनी गलतियों से सीखते हुए देश की जनता का विश्वास दोबारा हासिल करना चाहिए। वहीं मोदी सरकार को कुछ ऐसा करना चाहिए जिससे कि विपक्ष के नकारात्मक रवैए से पार पाया जा सके। ऐसा न हो की एक दल के अड़ियल रुख से लोकतंत्र का मंदिर संसद बंधक बनता नजर आए।

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