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विश्वास मत के बहाने विवाद की राजनीति

शिव सेना महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा को हाशिए पर ही रखना चाहती थी

विश्वास मत के बहाने विवाद की राजनीति
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उम्मीद के अनुरूप बुधवार को महाराष्ट्र विधानसभा में बारह दिन पुरानी मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस की सरकार ने ध्वनिमत से विश्वास मत हासिल कर लिया। क्योंकि राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) ने पहले ही अपना रुख स्पष्ट कर दिया था कि वह विश्वास मत के दौरान भाजपा सरकार का विरोध नहीं करेगी। ऐसा हुआ भी जब एनसीपी के सभी विधायक सदन से बाहर चले गए। 288 सदस्यों वाली विधानसभा में एनसीपी के विधायकों की संख्या 41 है। इनके बाहर जाने के बाद भाजपा को विश्वास मत हासिल करने के लिए तकनीकी रूप से 124 विधायकों की ही जरूरत रह गई थी।

भाजपा के विधायकों की संख्या 121 है, जबकि छह निर्दलीय समेत मनसे के एक विधायक ने फडणवीस सरकार को समर्थन देने का ऐलान पहले ही कर रखा था। लिहाजा भाजपा सरकार को सदन में कोई खतरा नहीं था, लेकिन शिवसेना और कांग्रेस की ओर से जिस तरह से इसका विरोध किया जा रहा है, कि विश्वास मत हासिल करने में उचित प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और उनके द्वारा फिर से इस प्रक्रिया को मत विभाजन के जरिए पूरा करने की मांग करना, वह हैरान करने वाला है। क्योंकि विश्वास मत से पूर्व किसी भी पार्टी की ओर से मतदान की मांग नहीं की गई थी।

पूर्व में कई मामलों में विधानसभा अध्यक्ष अपने विवेक का इस्तेमाल करते रहे हैं। जब एनसीपी के रुख के बाद भाजपा के पास पर्याप्त आंकड़े होने की बात स्पष्ट हो गई तभी विधानसभा अध्यक्ष ने मतदान की बजाय ध्वनिमत से प्रक्रिया पूरी करा दी। यहां कांग्रेस और शिवसेना की मंशा पर ही सवाल खड़ा होता है? अभी सदन में शिवसेना के पास 63 और कांग्रेस के पास 42 विधायक हैं। यदि इनको मिला भी दें तो आंकड़ा 105 ही होता है। इसके दम पर दोनों दल भाजपा को विश्वास मत हासिल करने से रोकने में सक्षम नहीं थे। दोनों पार्टियां बेवजह विवाद बढ़ाने का प्रयास करती प्रतीत हो रही हैं। शिवसेना की बैखलाहट समझी जा सकती है। चुनाव पूर्व सीटों पर तालमेल नहीं हो पाने के कारण भाजपा के साथ उसका 25 वर्षों का गठबंधन टूट गया था।

दरअसल, वह महाराष्ट्र की राजनीति में भाजपा को हाशिए पर ही रखना चाहती थी! वह न केवल भाजपा को कम सीट देना चाहती थी बल्कि मुख्यमंत्री भी अपने उम्मीदवार को बनाना चाहती थी। भाजपा को यह मंजूर नहीं था वह बराबर की हिस्सेदारी चाहती थी। चुनाव बाद भाजपा शिवसेना के मुकाबले करीब दोगुनी सीटें जीत सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। वहीं कांग्रेस 15 साल सत्ता में रहने के बाद भी तीसरे स्थान पर खिसक गई। विधानसभा चुनाव महाराष्ट्र की राजनीति में ऐतिहासिक बदलाव साबित हुआ और भाजपा पहली बार अपना मुख्यमंत्री बनाने में सफल रही।

आज शिवसेना का नेतृत्व पूरी तरह भ्रम की स्थिति में है। कभी वह सरकार में शामिल होने की बात करता है तो कभी विपक्ष में बठने की। आलम यह हैकि उसके अस्पष्ट और अड़ियल रुख के कारण शिवसेना के विधायकों में भारी असंतोष की खबरें हैं। आने वाले दिनों में शिवसेना टूट जाए तो आश्चर्य नहीं होगा। उसके लिए बेहतर यही होगा कि विधानसभा में बेवजह टकराव से बाज आ कर अपने घर को संभाले और अपना रुख स्पष्ट करे। क्योंकि इस तरह कांग्रेस से ज्यादा उसी की फजीहत हो रही है। कांग्रेस भी अपनी स्थिति समझे और सिर्फ विरोध के लिए विरोध करने की बजाय रचनात्मक विपक्ष की भूमिका निभाने की तैयारी करे।

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