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चर्चा में जजों की नियुक्ति वाली कॉलेजियम प्रणाली

कॉलेजियम सुप्रीम कोर्ट की वह व्यवस्था है, जिससे सुप्रीम कोर्ट और सभी हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति होती है।

चर्चा में जजों की नियुक्ति वाली कॉलेजियम प्रणाली
कॉलेजियम प्रणाली फिर चर्चा में है। कॉलेजियम सुप्रीम कोर्ट की वह व्यवस्था है, जिससे सुप्रीम कोर्ट और सभी हाईकोर्ट के न्यायाधीशों की नियुक्ति होती है। हालांकि, यह प्रणाली भारतीय संविधान में वर्णित नहीं है। कॉलेजियम की कार्य-प्रणाली को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। वर्ष 1993 में, जबसे जजों की नियुक्ति का काम कार्यपालिका के हाथ से न्यायपालिका के हाथों में आया है, तभी से यह व्यवस्था सवालों में रही है। पिछले दिनों इसकी खामियों को लेकर बहस तब और तेज हो गई जब मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश और सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश रह चुके मर्कण्डेय काटजू ने एक लेख में एक पूर्व जज को सेवा विस्तार देने का मामला उठाया। जबकि उस जज के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतें थीं, लेकिन यूपीए-1 सरकार में शामिल पार्टी डीएमके उनकी नियुक्तिके पक्ष में थी। पहले उन्हें सेवा विस्तार दिया गया और बाद में स्थायी जज बना दिया गया। हालांकि इस प्रणाली के पक्ष में तर्क दिया जाता रहा है कि जजों की नियुक्ति का अधिकार न्यायपालिका के हाथों में होने से इसकी स्वतंत्रता सुनिश्चित होती है। कार्यपालिका का हस्तक्षेप नहीं होता। परंतु इस प्रकरण ने न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम व्यवस्था में कई खामियों को सामने लाया है। जजों की नियुक्ति में पारदर्शिता लाने और बदलते समय के साथ बेहतर जजों की बहाली के लिए एक राष्ट्रीय आयोग का गठन समय की मांग है। अब वक्त आ गया है कि न्यायपालिका में निचले स्तर से लेकर शीर्ष तक सुधारों की प्रक्रिया प्रारंभ हो जानी चाहिए। अब देश में एक राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन की प्रक्रिया की संभावनाएं तलाशने की जरूरत जोर पकड़ रही है। इस संबंध में भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार ने सक्रियता दिखाई है। सोमवार को देश के तमाम कानूनविदों और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद की बैठक में इस पर एक आम राय बनाने की कोशिश की गई कि वर्तमान कॉलेजियम प्रणाली को खत्म कर जजों की नियुक्ति को ज्यादा पारदर्शी बनाने के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन किया जाना चाहिए। इसमें कोई दो राय नहीं कि न्यायपालिका में सुधार की जरूरत है। जिस तरह से न्यायतंत्र में भ्रष्टाचार और जटिलताएं सामने आ रही हैं उसे दूर करना समय की मांग है। इसके लिए केंद्र सरकार द्वारा संसद में न्यायिक नियुक्ति आयोग विधेयक के साथ-साथ न्यायिक जवाबदेही विधेयक लाए जाने की उम्मीद है। तमाम विवादों से स्पष्ट है कि कॉलेजियम व्यवस्था असफल है, परंतु दूसरी जो भी व्यवस्था बने, उसमें ऐसे इंतजाम अवश्य किए जाने चाहिए कि वह पेशेवर तथा पारदर्शी तरीके से काम कर सके, जोड़तोड़ न हो और उचित व्यक्ति जज बने। ताकि हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक के जजों की नियुक्ति में हर किसी के लिए समान अवसर आए। अभी भी लोगों का अंतिम भरोसा न्यायपालिका ही है। अर्थात कार्यपालिका जब अपने दायित्वों का निर्वाह करने में विफल होने लगती है तो लोगों की उम्मीदें एक स्वतंत्र न्यायपालिका पर ही टिक जाती हैं। इन बदलावों से न्यायपालिका की स्वतंत्रता किसी भी सूरत में बाधित नहीं होनी चाहिए।
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