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ब्रह्मपुत्र नदी पर चीनी बांध ने बढ़ाई चिंता

ब्रह्मपुत्र नदी को तिब्बत में यारलुंग जांगबो नदी के नाम से जाना जाता है।

ब्रह्मपुत्र नदी पर चीनी बांध ने बढ़ाई चिंता

नई दिल्ली. चीन ने मंगलवार को अपने जांगमू हाइड्रो पावर स्टेशन की सभी छह इकाइयों को पावर ग्रिड से जोड़ दिया। इसकामतलब है कि तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर बनाए गए उसके बांध से बिजली का उत्पादन शुरू हो गया है, लेकिन इसके साथ ही भारत की चिंताएं बढ़ गई हैं कि कहीं आने वाले दिनों में इस परियोजना से नदी में जल आपूर्ति में व्यवधान न पैदा हो जाए। यह बांध दुनिया की सर्वाधिक ऊंचाई पर बना है। इस पर डेढ़ अरब अमेरिकी डॉलर की लागत आई है। यह बिजली उत्पादन के लिए ब्रह्मपुत्र नदी के पानी का इस्तेमाल करता है।

ब्रह्मपुत्र नदी को तिब्बत में यारलुंग जांगबो नदी के नाम से जाना जाता है। ब्रह्मपुत्र नदी तिब्बत से भारत आती है और फिर वहां से बांग्लादेश जाती है। चीन का कहना है कि इस परियोजना से हर साल 2.5 अरब किलोवाट-घंटा बिजली का उत्पादन होगा, जिससे तिब्बत में बिजली की कमी दूर हो जाएगी। इससे इस क्षेत्र के विकास की रफ्तार तेज होगी। दरअसल, ब्रह्मपुत्र नदी की रणनीतिक स्थिति को देखते हुए भारत इस परियोजना पर अपनी चिंता जाहिर करता रहा है। ब्रह्मपुत्र पर भारत सरकार के एक अंतर-मंत्रालय विशेषज्ञ समूह ने 2013 में कहा था कि तिब्बत में ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन द्वारा बनाए जा रहे बांध से भविष्य में भारत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है। उसने इससे भारत में इस नदी के बहाव में व्यवधान पैदा होने की आशंका जताई थी। तब भारत सरकार ने चीन के साथ होने वाली द्विपक्षीय बातचीत में अपनी चिंता जाहिर की थी, लेकिन वह कोई माकूल जवाब नहीं दे सका।

चीन की तरफ से बस यही कहा गया कि यह रन-ऑफ-द-रिवर परियोजना है जिसका डिजाइन पानी के भंडारण के लिए नहीं किया गया है। अर्थात यह ऐसा बांध है, जिसमें पानी जमाकर रखने की जरूरत नहीं होती है। इस डिजाइन पर आधारित पनबिजली परियोजनाओं से नदी का बहाव अप्रभावित जारी रहता है। वहीं विशेषज्ञों का कहना है कि नदी जल का प्राकृतिक बहाव मार्ग बदले बिना इतनी बड़ी मात्रा में बिजली बनाना कठिन है। यही वजह है कि चीन के आश्वासन के बाद भी भारत की आशंका दूर नहीं हो सकी है। भारत की चिंता है कि चीन युद्ध जैसे हालातों में इन बांधों का उपयोग भारत के हिस्से का पानी रोकने और कभी एक साथ ज्यादा पानी छोड़ने के लिए कर सकता है। और यदि ऐसा होता है तो भारत के पूर्वोत्तर राज्यों के कई इलाके बाढ़ की चपेट में आ सकते हैं। ऐसा होने पर ब्रह्मपुत्र नदी पर बन रही भारतीय परियोजनाएं भी बाधित हो जाएंगी। भारत अरुणाचल प्रदेश में अपर सियांस व लोवर सुहानर्शी परियोजनाओं का निर्माण कर रहा है।

ये दोनों ब्रह्मपुत्र के बहाव पर ही निर्भर हैं। हालांकि 2013 में बनी सहमति के अनुसार चीन मई से अक्टूबर के दौरान ब्रrापुत्र की बाढ़ के आंकड़े भारत से साझा करता है, लेकिन अब इस परियोजना के शुरू होने से परिस्थितियां बदल गई हैं। लिहाजा भारत को चीन के द्विपक्षीय वार्ता में इस बांध से जुड़े मुद्दे को अपनी प्राथमिकता सूची में और ऊपर लाना चाहिए क्योंकि भारत को परेशानी में डालने वाली एक ताकत उसके हाथ लग गई है।

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