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चिंतन: पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार जरूरी

देश में पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार बहुत जरूरी हो गया है।

चिंतन: पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार जरूरी
गुजरात के कच्छ के रण में तीन दिनों तक चले राज्यों के पुलिस महानिदेशकों के सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पुलिस महकमे में बुनियादी सुधार के लिए जो बातें कहीं उसकी जरूरत लंबे समय से महसूस की जा रही है। जैसे कि उन्होंने कहा कि पुलिस को संवेदनशील होना चाहिए, लचीला रुख अपनाते हुए स्थानीय समुदाय के साथ संपर्क बढ़ाना चाहिए जिससे लोग उस पर भरोसा कर सकें, अलग-अलग जिलों व राज्यों के पुलिस के बीच बेहतर तालमेल होना चाहिए और रोजर्मरा के कामों में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाना चाहिए।
आज सुरक्षा के दृष्टिकोण से समाज के सामने जिस तरह की नई-नई चुनौतियां आ रही हैं, अपराध के तरीके बदल रहे हैं, पुलिस तंत्र से लोगों की अपेक्षाएं दिनोंदिन बढ़ रही हैं, उसे देखते हुए देश में पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार बहुत जरूरी हो गया है। वर्ष 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की कार्यप्रणाली में बुनियादी परिवर्तन करने के लिए सभी राज्यों को सख्त निर्देश दिए थे, लेकिन विडंबना है कि उस पर अब तक अमल नहीं हो सका है।
कई बार डांट-फटकार के बाद भी राज्य इस पर सक्रियता नहीं दिखा रहे हैं। हालांकि कुछ राज्यों ने इस दिशा में कदम जरूर उठाए हैं, लेकिन वह भी आधे-अधूर ही हैं। प्रधानमंत्री की नसीहत के बाद उम्मीद है कि राज्य सरकारें इस दिशा में गंभीरता दिखाएंगी। दुर्भाग्यवश आज पुलिस की छवि ऐसी है कि कोई घटना होने पर भी लोग उसके पास जाने से कतराते हैं। जबकि उसकी साख एक दोस्त की तरह होनी चाहिए।
दरअसल, राज्यों पर आरोप लगते रहे हैं कि वे पुलिस को अपने नियंत्रण में रखने की मंशा से इसमें सुधार को लटका रहे हैं। वहीं इसके लिए जरूरी संसाधन नहीं होने का बहाना भी राज्य करते रहे हैं। आज पुलिस की चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं, लेकिन उस अनुपात में उसके संसाधन नहीं बढ़ रहे हैं। न तो उसके पास पर्याप्त आधुनिक हथियार हैं, न ही मानव बल है। इसके अलावा तकनीक और दूसरी जरूरी सुविधाओं तक उसकी पहुंच भी सीमित है।
यही वजह है कि आज अपराधी कई मामलों में उससे आगे दिख रहे हैं। अब समय आ गया है कि इन कमियों को दूर किया जाए। इसमें देरी आंतरिक सुरक्षा के लिए खतरनाक हो सकती है। यदि केंद्र सरकार इस दिशा में स्वयं पहल कर राज्यों से चर्चा करे तो कुछ उम्मीद बंध सकती है।
राज्यों के पुलिस महानिदेशकों का यह सम्मेलन ऐसे समय में हुआ जब देश पर आईएस व अलकायदा के आतंक और साइबर अपराध का खतरा मंडरा रहा है, वहीं दूसरी तरफ महिला सुरक्षा और आपदा प्रबंधन के मोर्चे पर चुनौतियां लगातार बढ़ रही हैं।
ऐसे में पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार और उसे हर तरह के संसाधनों से लैस करने में टालमटोल घातक हो सकता है। साथ ही प्रधानमंत्री ने जिन बातों का जिक्र किया है उसे पुलिस को अपनी कार्यसंस्कृति का हिस्सा बनाना चाहिए जिससे उसकी मानसिकता भी बदल सके।
जब तक वह संवेदनशीलता को अपना अनिवार्य अंग नहीं बनाएगी, न तो लोगों में सुरक्षा का एहसास पैदा कर पाएगी, न ही युवाओं को गुमराह होने से बचा पाएगी।
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