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मौसम के बदले मिजाज ने बढ़ाई चिंता

कई राज्यों में इस बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से चौपट हुई फसलों व बैंकों के कर्ज के कारण किसानों की मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा है। आहत किसान आत्महत्या कर रहे हैं।

मौसम के बदले मिजाज ने बढ़ाई चिंता
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पश्चिमी विक्षोभ एक बार फिर सक्रिय हो गया है। इसके चलते उत्तर भारत के पर्वतीय राज्यों में जहां बर्फबारी हो रही है, वहीं मैदानी इलाकों में बेमौसम बारिश हो रही है। मौसम में यह असमय उथल-पुथल अपने साथ आफतों की ढेर सारी सौगातें लेकर आया है। शहरी इलाकों में जगह-जगह भारी जल जमाव और ट्रैफिक जाम की समस्या से तो कुछ घंटों में निजात मिल भी जाती है, लेकिन देश के किसानों को इस बारिश ने जो जख्म दिए हैं, उसके घाव लंबे समय तक हरे रहेंगे।

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लाखों एकड़ खेतों में खड़ी उनकी फसलों को बारिश और उस दौरान पड़े ओले ने बुरी तरह तबाह कर दिए हैं। कई राज्यों में इस बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से चौपट हुई फसलों व बैंकों के कर्ज के कारण किसानों की मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा है। आहत किसान आत्महत्या कर रहे हैं। वहीं दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर में भी भयावह स्थिति बनी हुई है।

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वहां शनिवार से हो रही भारी बारिश ने घाटी में बाढ़ की हालत पैदा कर दी है। झेलम सहित कईनदियां खतरे के निशान से ऊपर बह रही हैं। कई इलाकों में पानी भरने से लोग अपना घर-बार छोड़कर सुरक्षित स्थानों पर जाने को विवश हो रहे हैं, जो कि चिंता की बात है। हालांकि केंद्र सरकार और राज्य सरकार मिलकर राहत व बचाव कार्य कर रही हैं। प्रशासन को समय रहते राहत व बचाव के सारे इंतजाम कर लेने चाहिए जिससे नुकसान कम से कम हो। कश्मीर घाटी में पिछले साल सितंबर में भी भीषण बाढ़ आई थी, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए थे। वहीं बेमौसम बारिश से तबाह हुए किसानों की क्षतिपूर्ति के लिए केंद्र सरकार सर्वे कर रही है। संभावित नुकसान का आकलन किया जा रहा है। कई मंत्री प्रभावित राज्यों के दौरे पर हैं। प्रभावित किसानों को उचित मुआवजा मिलना चाहिए, जिससे वे मौसम की मार से उबर सकें।

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एक बड़ी चिंता बेमौसमी बारिश के कारण खाद्य वस्तुओं जैसे- गेहूं, आलू, अदरक, चना समेत कई सब्जियों और दालों की कीमतें बढ़ने की आशंका को लेकर है। ऐसे में केंद्र व राज्य सरकारों को इस चुनौती से भी निपटने की रणनीति में समय रहते लग जाना चाहिए। इसके लिए सरकार को किसी तरह से खाद्य वस्तुओं की आपूर्ति बढ़ाने और जमाखोरी पर लगाम लगाना चाहिए। बहरहाल, मार्च के महीने में देश के इतने बड़े हिस्से में इतनी तेज और इतनी लंबी बारिश कोई मामूली बात नहीं है। अतिवृष्टि और अनावृष्टि तो पहले भी मुसीबत बनती थीं, लेकिन बारिश का यह बदला चक्र कईतरह की परेशानी खड़ा कर रहा है।

यहां एक बात पूरी तरह स्पष्ट है कि मौसम की चाल बदल गई है। यह कोईएक देश यानी भारत की समस्या नहीं है, बल्कि पूरी दुनिया इसकी चपेट में है। अर्थात पूरी दुनिया में मौसम का मिजाज बिगड़ा हुआ है। इसकी गंभीरता को समझना होगा। हालांकि दुनिया अभी भी इसकी भयावहता को समझने में न तो सतर्कता बरत रही है और न ही तत्परता दिखा रही है।

मौसम विभाग नियमित रूप से मौसम की जानकारी देता है, लेकिन यह मामला इससे बढ़कर है। हमें इस विनाशकारी बदलाव के कारणों की तह में जाकर उनका निवारण करना होगा। क्योंकि खेती-बाड़ी, रहन-सहन, उद्योग-धंधे काफी हद तक मौसम पर ही निर्भर करते हैं। ऐसे में सरकारों और वैज्ञानिकों की जिम्मेदारी काफी बढ़ जाती है।

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