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भारत की हकीकत बता रहे हैं ये आंकड़े

किसी भी देश की सामाजिक-आर्थिक व जातिगत सरंचना में होने वाले निरंतर बदलावों को जानने का सबसे बेहतर तरीका जनगणना रहा है।

भारत की हकीकत बता रहे हैं ये आंकड़े

किसी भी देश की सामाजिक-आर्थिक व जातिगत सरंचना में होने वाले निरंतर बदलावों को जानने का सबसे बेहतर तरीका जनगणना रहा है। इसकी विश्वसनीयता इसलिए भी असंदिग्ध होती है, क्योंकि सभी आंकड़े व्यक्तिगत रूप से पूछ कर जुटाए जाते हैं। भारत में जनगणना का लंबा इतिहास रहा है। वर्ष 1931 से देश में इसकी शुरुआत हुई थी तब पहली बार इस तरह की जनगणना की गई थी। उसके अस्सी साल बाद दोबारा आजाद भारत में सामाजिक-आर्थिक और जाति के आयाम को 2011 की जनगणना में जोड़ा गया था, जिसमें से सामाजिक-आर्थिक जनगणना के आंकड़े शुक्रवार को जारी किए गए जबकि जाति के आधार पर जनगणना के आंकड़े अभी जारी नहीं किए गए हैं। इन आंकड़ों के जरिए भारत की जो तस्वीर सामने आ रही है, वह निश्चित रूप से चिंताजनक है।

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इस जनगणना के मुताबिक देश में अभी भी सत्तर फीसदी आबादी गांवों में रहती है तथा करीब आधे परिवार गरीब हैं और ऐसा हर पांचवां परिवार अनुसूचित जाति-जनजाति वर्ग से ताल्लुक रखता है। ग्रामीण भारत के सवा तेरह फीसदी परिवार ऐसे हैं जो सिर्फ एक कमरे के कच्चे मकान में रहते हैं। अगर राज्यवार देखें तो ग्रामीण आबादी में गरीबों का अनुपात सबसे ज्यादा मध्यप्रदेश में है। दूसरे नंबर पर छत्तीसगढ़ है। फिर बिहार और उत्तर प्रदेश का स्थान आता है। देश में ग्रामीण और शहरी इलाकों में परिवारों की कुल संख्या 24.39 करोड़ है। इनमें से ग्रामीण इलाकों में परिवारों की संख्या 17.91 करोड़ है। इस कुल संख्या में से 39.39 प्रतिशत यानी 7.05 करोड़ परिवार गरीब नहीं माने गए हैं। इसके लिए जिन 14 मानकों को आधार बनाया गया है उनमें प्रमुख है कि घर में कोई भी दो, तीन या चार पहिया वाहन हो, किसान क्रेडिट कार्ड जिसकी सीमा 50 हजार से ज्यादा हो, घर का कोई सदस्य सरकारी कर्मचारी हो, ऐसा परिवार जिसके पास सरकार के पास रजिस्टर्ड गैर कृषि उद्यम हो, घर के किसी भी सदस्य की आय 10 हजार रुपये से ज्यादा हो आदि शामिल हैं। इस तरह देखा जाए तो ग्रामीण क्षेत्र के दस करोड़ से ज्यादा परिवार गरीबी में जीवन यापन कर रहे हैं। इसमें ऐसे परिवारों की बहुतायत है जिनके पास घर नहीं है, भिक्षावृत्ति पर जिंदा हैं या बंधुआ मजदूर आदि हैं।

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इसके अलावा ऐसे परिवार जिनके पास जमीन नहीं है और परिवार को मजदूरी के माध्यम से चलाते हैं उनकी संख्या 5.37 करोड़ है। वहीं कुल ग्रामीण परिवारों में से 5.39 करोड़ परिवारों की आय का जरिया खेती है। वहीं 9.16 करोड़ परिवार अस्थिर र्शम से होने वाले आय पर निर्भर हैं। सरकारी नौकरी, प्राइवेट नौकरी आदि से आय प्राप्त करने वालों की संख्या सिर्फ 2.50 करोड़ है। जाहिर है, इन निष्कर्षों से यह पता चलता है कि समाज में किस तबके की भागीदारी कितनी है और उसे किस तरह की योजनाओं की जरूरत है। इन आंकड़ों की मदद से सरकार को सामाजिक क्षेत्र की योजनाओं खासकर बीपीएल परिवारों के लिए चलाई जाने वाली योजनाओं को और बेहतर तरीके से क्रियान्वयन करने पर जोर देना चाहिए। ताकि अगली बार जब आंकड़े आएं तो देश की ऐसी तस्वीर सामने न आए।

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