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चिंतन: आर्थिक सर्वे के आईने में बजट की चुनौतियां

नई सरकार से हर वर्ग और सेक्टर अपने लिए राहतों और रियायतों की सौगात चाह रहा है।

चिंतन: आर्थिक सर्वे के आईने में बजट की चुनौतियां
देश की अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा को बताने वाले आर्थिक सर्वे (वर्ष 2013-14 के लिए) को वित्तमंत्री अरुण जेटली ने बुधवार को लोकसभा में पेश किया। इसे देखकर कहा जा सकता है कि अभी भी देश की आर्थिक सेहत बहुत अच्छी नहीं है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की विकास दर अगले साल भी कोई सुखद रहने वाली नहीं है। जब देश की जीडीपी की विकास दर प्रत्येक वर्ष आठ या नौया दस प्रतिशत के स्तर पर पहुंचे तब माना जाता है कि उस देश की विकास की गति और रोजगार स्वत: ही बढ़ जाते हैं। वहीं राजकोषीय घाटा अभी भी 4.5 फीसदी के खतरनाक स्तर पर बना हुआ है, जो चिंताजनक है।
इसका मतलब यह होता है कि सरकार की आमदनी और खर्च में इतना अंतर है। इसको घटाने के लिए दो तरीके होते हैं। पहला, सरकार जनता पर करों का बोझ बढ़ाए। दूसरा, लोगों को दी जा रही सब्सिडी में कटौती की जाए। परंतु मौजूदा स्थिति में मोदी सरकार ये दोनों खतरे नहीं उठाना चाहेगी। ऐसे में सरकार को अपनी आमदनी बढ़ाने के लिए दूसरे स्रोतों पर निर्भर रहना पड़ेगा है। ऐसी हालत में किसी भी सरकार को अपनी राजस्व प्राप्तियों को बढ़ाना चाहिए और साथ ही ऐसी योजनाओं से परहेज करना चाहिए जिससे खर्चे बढ़ते हों और आमदनी बहुत देर से शुरू होने की संभावना हो, लेकिन रोजगार सृजन के लिए मोदी सरकार को बुनियादी ढांचे के विकास पर खर्च करना होगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने चुनाव प्रचार अभियान के दौरान व उसके बाद भी देश में 100 नए आधुनिक शहर बसाने का ऐलान किया था। प्रत्येक राज्य को एक एम्स देने की घोषणा की थी। देश में विश्वस्तरीय विश्वविद्यालय खोलने की बात कहीथी। कनेक्टिविटी बढ़ाने का वादा किया था। हेल्थ, शिक्षा और विनिर्माण इन सभी क्षेत्रों में नियोजित तरीके से आगे बढ़ने के संकेत दिए थे। वहीं सबसे बड़ा सवाल यह है कि सरकार के पास काम करने की इच्छाशक्ति है, उसके पास दृष्टि है, परंतु उसके सामने इन सबको कार्यों में परिणित करने के लिए जरूरी संसाधन जुटाने की चुनौती है। देशवासी मोदी सरकार से अच्छे दिनों की उम्मीद लगाए बैठे हैं।
नई सरकार से हर वर्ग और सेक्टर अपने लिए राहतों और रियायतों की सौगात चाह रहा है। नौकरीपेशा आयकर की सीमा में छूट चाहते हैं, तो कई बैंकों से मिलने वाले होम लोन को सस्ता बनाने की मांग कर रहे हैं। अभी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में राजग सरकार के बने डेढ़ महीने ही हुआ है पर आकांक्षाओं का पहाड़ उसके सामने है। इस साल अल नीनो प्रभाव के कारण अच्छे मानसून की संभावना नहीं है। खाद्य वस्तुओं की कीमतों व राजकोषीय घाटा को नियंत्रित करना बड़ी चुनौती बन गई है। ऐसे हालातों में मोदी सरकार के पहले बजट से कोई बहुत बड़ी उम्मीदें पालना सही नहीं होगा। इन सब चुनौतियों के बीच सरकार वास्तव में देशवासियों को कितना राहत दे पाती है यह भी देखने वाली बात होगी, परंतु इतना तय माना जा रहा है कि आम बजट में भाजपा की अगुआई वाली केंद्र सरकार खुद को उस सपने की तरफ जरूर बढ़ते हुए दिखाएगी, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चुनाव प्रचार के दौरान देश की जनता को दिखाए थे।
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